सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! वोटर लिस्ट से नाम हटने पर नहीं जाएगी नागरिकता, चुनाव आयोग की सीमा भी की स्पष्ट

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत चुनाव आयोग की भूमिका केवल मतदाता सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने या हटाने तक सीमित है। यदि किसी मतदाता की नागरिकता को लेकर संदेह हो, तो आयोग उसका नाम मतदाता सूची से हटा सकता है, लेकिन नागरिकता पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार केवल नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत सक्षम प्राधिकारी के पास ही रहेगा।

चुनाव आयोग नागरिकता तय करने वाला प्राधिकारी नहीं

उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि मतदाता सूची से नाम हटने के बाद कई लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली, महिलाओं की नकद हस्तांतरण योजना, अन्नपूर्णा योजना और जाति प्रमाण पत्र के सत्यापन जैसी सरकारी सुविधाओं से भी वंचित होना पड़ रहा है।

बिहार एसआईआर फैसले का दिया हवाला

मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर 27 मई को दिए गए फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है या नहीं।

सक्षम प्राधिकारी ही करेगा नागरिकता पर अंतिम फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि चुनाव आयोग को किसी मतदाता की नागरिकता पर संदेह होता है, तो वह चुनावी प्रक्रिया के उद्देश्य से उसका नाम मतदाता सूची से हटा सकता है। हालांकि आयोग की जिम्मेदारी होगी कि वह संबंधित मामला नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत निर्णय के लिए केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी के पास भेजे। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक सक्षम प्राधिकारी कोई अंतिम निर्णय नहीं लेता, तब तक संबंधित व्यक्ति का नागरिक का दर्जा बना रहेगा और वह नागरिकों को मिलने वाले अधिकारों तथा सरकारी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पाने का हकदार रहेगा।

मतदाता सूची तैयार करना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने कहा कि कानून इस विषय में पूरी तरह स्पष्ट है। चुनाव आयोग का दायित्व मतदाता सूची तैयार करना, उसका रखरखाव करना और उसमें आवश्यक संशोधन करना है। यदि किसी व्यक्ति की पात्रता पर संदेह हो तो आयोग को कानून के अनुसार मामला सक्षम प्राधिकारी के पास भेजना होगा।

33 लाख से अधिक अपीलों की हो रही सुनवाई

यह मामला पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाए जाने से जुड़ी 33 लाख से अधिक अपीलों की सुनवाई से संबंधित है। कई मामलों में एक ही परिवार के सदस्यों के नामों की वर्तनी में अंतर जैसी तकनीकी विसंगतियों के कारण नाम हटाए गए थे। इन अपीलों की सुनवाई के लिए गठित 19 अपीलीय ट्रिब्यूनलों के कामकाज को लेकर याचिकाएं दायर की गई हैं।

पासपोर्ट को नागरिकता का प्रमाण मानने की दलील

वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि लगभग 33.5 लाख अपीलें लंबित हैं और जिन मामलों का निस्तारण हो चुका है, उनमें से करीब 70 प्रतिशत अपीलें स्वीकार की गई हैं। उन्होंने यह भी दलील दी कि पासपोर्ट को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि अपील लंबित रहने के दौरान लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित कई सरकारी योजनाओं से वंचित किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 25 अगस्त की तारीख तय की है।

 

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