भारत के अंतरिक्ष इतिहास में नया अध्याय, प्राइवेट कंपनी का पहला ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ लॉन्च; जानें मिशन की पूरी कहानी
श्रीहरिकोटा: भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। देश का पहला निजी तौर पर विकसित ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ शनिवार को आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सफलतापूर्वक लॉन्च किया गया। मिशन ‘आगमन’ के तहत भेजे गए इस रॉकेट ने तकनीकी पेलोड और विशेष संदेशों के साथ उड़ान भरी। यह रॉकेट पृथ्वी की निचली कक्षा में करीब 450 किलोमीटर तक पहुंचने के लिए तैयार किया गया है।
इस ऐतिहासिक लॉन्च के दौरान इसरो के वैज्ञानिक भी मौजूद रहे। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने विक्रम-1 के प्रक्षेपण का सीधा प्रसारण देखा। लॉन्चिंग से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस मिशन से जुड़े वैज्ञानिकों और टीम को शुभकामनाएं दी थीं।
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए बड़ा कदम
विक्रम-1 की लॉन्चिंग को भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। यह पहली बार है जब किसी भारतीय निजी कंपनी द्वारा विकसित ऑर्बिटल श्रेणी के रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजा गया है।
इस मिशन के जरिए भारत सरकारी अंतरिक्ष अभियानों से आगे बढ़कर निजी कंपनियों के नेतृत्व वाले अंतरिक्ष अभियानों की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति जारी की थी, जबकि 2024 से अंतरिक्ष क्षेत्र में 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गई थी। सरकार के अनुसार, पिछले एक दशक में अंतरिक्ष क्षेत्र में 300 से अधिक स्टार्टअप शुरू हुए हैं।
क्या है विक्रम-1 की खासियत
विक्रम-1 भारत का पहला निजी वाणिज्यिक प्रक्षेपण यान है। इसका नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक डॉ. विक्रम साराभाई के नाम पर रखा गया है। इसे छोटे उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित करने के लिए तैयार किया गया है।
यह रॉकेट करीब 24 मीटर लंबा है और इसे हल्के कार्बन कॉम्पोजिट ढांचे से बनाया गया है। इसमें तीन ठोस ईंधन चरण और एक तरल ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है। यह करीब 350 किलोग्राम तक के पेलोड को 450 किलोमीटर की पृथ्वी की निचली कक्षा में पहुंचाने की क्षमता रखता है।
इस मिशन के साथ प्रयोगशाला में तैयार ‘डायमंड लोटस’ पेलोड भी भेजा गया है। इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हाथ से लिखा ‘वंदे मातरम’ संदेश वाला पोस्टकार्ड भी विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष में भेजा गया है।
सब-ऑर्बिटल और ऑर्बिटल रॉकेट में क्या है अंतर
सब-ऑर्बिटल रॉकेट अंतरिक्ष की सीमा तक पहुंचने के बाद वापस लौट आते हैं, जबकि ऑर्बिटल रॉकेट इतनी तेज गति प्रदान करते हैं कि उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में लगातार घूमता रहता है।
विक्रम-1 की सफलता के बाद पहली बार किसी भारतीय निजी कंपनी का रॉकेट उपग्रहों को कक्षा में स्थापित करने की क्षमता साबित करेगा। इससे भारत वैश्विक निजी कक्षीय प्रक्षेपण बाजार में अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज करा सकेगा।
चार चरणों में काम करता है विक्रम-1
विक्रम-1 चार चरणों वाला रॉकेट है। इसके शुरुआती तीन चरणों में ठोस ईंधन का इस्तेमाल किया गया है, जबकि चौथे चरण में तरल ईंधन इंजन लगाया गया है। इस इंजन को जरूरत पड़ने पर दोबारा शुरू किया जा सकता है, जिससे उपग्रह को उसकी निर्धारित कक्षा में अधिक सटीक तरीके से पहुंचाने में मदद मिलती है।
रॉकेट का ऑर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल पूरी तरह 3डी प्रिंटेड तरल इंजन से संचालित होता है। भारतीय ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल में इस तरह के इंजन का इस्तेमाल पहली बार किया गया है।
विक्रम-1 को तैयार करने में लगी 1000 वैज्ञानिकों की टीम
भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 को तैयार करने में करीब 1000 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की टीम ने काम किया। कई महीनों की मेहनत के बाद तैयार हुए इस रॉकेट को अंतरिक्ष में भेजा गया है।
इससे पहले स्काईरूट एयरोस्पेस ने 18 नवंबर 2022 को विक्रम-एस नाम का सब-ऑर्बिटल रॉकेट लॉन्च किया था। यह परीक्षण रॉकेट 301.4 सेकंड की उड़ान के बाद 88.8 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंचा था। इसी सफलता के बाद कंपनी ने तीन साल के भीतर विक्रम-1 तैयार किया।
स्काईरूट एयरोस्पेस ने कैसे शुरू किया सफर
स्काईरूट एयरोस्पेस की शुरुआत वर्ष 2018 में इसरो के पूर्व इंजीनियर पवन कुमार चंदाना और नागा भरत डाका ने की थी। दोनों ने अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनी बनाने के उद्देश्य से अपनी नौकरियां छोड़ीं और भारतीय स्टार्टअप को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने की दिशा में काम शुरू किया।
वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खुलने के बाद स्काईरूट ने ऑर्बिटल रॉकेट बनाने पर तेजी से काम किया। विक्रम-1 इसी लंबे प्रयास का सबसे बड़ा परिणाम माना जा रहा है।
भारत के वाणिज्यिक अंतरिक्ष मिशनों को मिलेगी नई रफ्तार
विक्रम-1 का सफल प्रक्षेपण भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे भविष्य में भारत से अधिक संख्या में वाणिज्यिक उपग्रहों के प्रक्षेपण की संभावनाएं बढ़ेंगी।
स्काईरूट एयरोस्पेस के अनुसार, यह मिशन भारतीय निजी अंतरिक्ष कंपनियों की तकनीकी क्षमता को दुनिया के सामने पेश करेगा और अंतरराष्ट्रीय उपग्रह प्रक्षेपण बाजार में नए अवसर पैदा करेगा।





