लाखों में इलाज, करोड़ों की बचत! UK-US छोड़ भारत क्यों आ रहे विदेशी मरीज, मेडिकल टूरिज्म ने पकड़ी रफ्तार
नई दिल्ली: दुनिया के कई विकसित देशों में अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध होने के बावजूद बड़ी संख्या में विदेशी मरीज अब इलाज के लिए भारत का रुख कर रहे हैं। ब्रिटेन में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के जरिए घुटनों की सर्जरी के लिए करीब तीन साल तक इंतजार करने वाले 51 वर्षीय जीन-पॉल इसका उदाहरण हैं। डबल नी रिप्लेसमेंट कराने भारत पहुंचे जीन-पॉल की सर्जरी मैक्स हेल्थकेयर में हुई। बताया गया कि ऑपरेशन के करीब चार घंटे बाद ही वह अपने पैरों पर खड़े हो गए। ब्रिटेन लौटने से पहले उन्होंने जरूरी फिजियोथेरेपी भी पूरी की। खास बात यह रही कि पूरी प्रक्रिया पर आया खर्च ब्रिटेन में निजी इलाज की तुलना में काफी कम रहा।
जीन-पॉल की यह कहानी ऐसे समय सामने आई है, जब भारत का मेडिकल टूरिज्म क्षेत्र तेजी से विस्तार कर रहा है। इससे पहले एक अमेरिकी महिला ने भी भारत में अपने देश की तुलना में कम समय और कम खर्च में इलाज मिलने का अनुभव साझा किया था। वहीं एक वायरल वीडियो में एक विदेशी महिला ने भारत के सरकारी अस्पताल में मुफ्त इलाज मिलने पर हैरानी जताई थी।
हालांकि ये अलग-अलग मरीजों के व्यक्तिगत अनुभव हैं, लेकिन इन घटनाओं ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए पहचाने जाने वाले पश्चिमी देशों के मरीज आखिर इलाज के लिए भारत क्यों पहुंच रहे हैं?
तेजी से बढ़ रहा मेडिकल टूरिज्म का बाजार
अनुमान है कि वर्ष 2026 तक भारत का मेडिकल टूरिज्म उद्योग करीब 1,17,510 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। खास बात यह है कि मेडिकल वैल्यू ट्रैवल का विस्तार देश के सामान्य पर्यटन क्षेत्र की तुलना में अधिक तेज गति से हो रहा है।
भारत के पर्यटन उद्योग के सालाना करीब 7 प्रतिशत की दर से बढ़ने का अनुमान है, जबकि मेडिकल वैल्यू ट्रैवल बाजार के करीब 16 प्रतिशत चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने और वर्ष 2031 तक 22.11 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद जताई गई है।
मेडिकल ट्रैवल कंपनी के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी साहिल जैन के मुताबिक, विदेशी मरीजों के भारत आने की वजह केवल इलाज की कम कीमत नहीं है। मरीज अब सुरक्षा, बेहतर समन्वय और इलाज के बाद मिलने वाली सहायता को भी उतना ही महत्व दे रहे हैं।
छह लाख से ज्यादा विदेशी मरीज भारत पहुंचे
सरकारी आंकड़े भी भारत में मेडिकल टूरिज्म की बढ़ती लोकप्रियता की तस्वीर पेश करते हैं। वर्ष 2020 में भारत आने वाले मेडिकल टूरिस्टों की संख्या 1.83 लाख थी। यह संख्या बढ़कर 2023 में 6.59 लाख हो गई।
वर्ष 2024 में भी 6.44 लाख मेडिकल टूरिस्ट भारत पहुंचे। वहीं जनवरी से नवंबर 2025 के शुरुआती आंकड़ों में ही विदेशी मरीजों की संख्या 4.5 लाख से ज्यादा हो चुकी थी।
भारत का बढ़ता ई-मेडिकल वीजा कार्यक्रम भी इस क्षेत्र को गति दे रहा है। अब 167 देशों के नागरिक इस सुविधा के दायरे में हैं। इससे विदेशी मरीजों के लिए भारत आकर इलाज कराना अपेक्षाकृत आसान हुआ है।
साहिल जैन के मुताबिक, बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों के अलावा ओमान, इराक, नाइजीरिया और तंजानिया से भी मरीज भारत पहुंच रहे हैं। पश्चिमी देशों में महंगा इलाज और लंबी प्रतीक्षा अवधि भी मरीजों को वैकल्पिक चिकित्सा केंद्र तलाशने के लिए प्रेरित कर रही है।
भारत में इलाज कितना सस्ता है?
मेडिकल टूरिज्म के क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी ताकत अब भी इलाज की लागत है। कई जटिल चिकित्सा प्रक्रियाओं की कीमत पश्चिमी देशों की तुलना में 60 से 80 प्रतिशत तक कम हो सकती है।
हार्ट बाईपास सर्जरी का भारत में अनुमानित खर्च 4,76,903 रुपये से शुरू होता है, जबकि अमेरिका में इसका खर्च करीब 1,43,07,097 रुपये तक बताया गया है।
घुटना प्रत्यारोपण की भारत में अनुमानित लागत 5,24,593 से 9,06,115 रुपये के बीच है, जबकि अमेरिका में यह करीब 28,61,452 से 66,76,722 रुपये तक हो सकती है।
इसी तरह भारत में आईवीएफ की अनुमानित लागत 2,19,378 से 4,76,908 रुपये के बीच है, जबकि अमेरिका में इसके लिए करीब 11,44,581 से 14,30,726 रुपये तक खर्च हो सकता है।
हालांकि वास्तविक लागत अस्पताल, डॉक्टर, बीमारी की गंभीरता, चिकित्सा प्रक्रिया और मरीज की जरूरतों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।
अब सिर्फ सस्ता इलाज नहीं, पूरा पैकेज दे रही कंपनियां
मेडिकल ट्रैवल उद्योग में अब केवल कम कीमत के आधार पर प्रतिस्पर्धा करने का दौर बदल रहा है। मरीजों को बेहतर अनुभव देने के लिए कंपनियां इलाज की पूरी प्रक्रिया को एक संपूर्ण पैकेज के रूप में पेश कर रही हैं।
इन पैकेज में अक्सर हवाई अड्डे से लाने-ले जाने की सुविधा, मरीज के साथ आने वाले लोगों के लिए ठहरने की व्यवस्था, फिजियोथेरेपी, पोषण संबंधी सहायता और स्वस्थ होने के बाद की सेवाएं शामिल होती हैं।
साहिल जैन के मुताबिक, अब जोर केवल सबसे कम कीमत पर इलाज उपलब्ध कराने पर नहीं है, बल्कि मरीज की पूरी चिकित्सा यात्रा के दौरान उसे जरूरी सहायता उपलब्ध कराने पर है।
सुरक्षा और इलाज के बाद की देखभाल भी बड़ी चुनौती
मेडिकल टूरिज्म में सुरक्षा और लंबे समय तक इलाज के बाद की निगरानी भी महत्वपूर्ण मुद्दे बन चुके हैं। तुर्किये जैसे देशों में मेडिकल टूरिस्टों को हुई परेशानियों से जुड़ी खबरों के बाद इलाज की गुणवत्ता, सुरक्षा मानकों और ऑपरेशन के बाद मरीज की देखभाल को लेकर चर्चा तेज हुई है।
कुछ कंपनियां हड्डियों की सर्जरी और दांतों के प्रत्यारोपण जैसी प्रक्रियाओं के लिए सर्जरी के बाद 12 महीने तक का बीमा कवर भी उपलब्ध करा रही हैं। अफ्रीकी देशों से आने वाले मरीजों के लिए कुछ योजनाओं में जरूरत पड़ने पर आपातकालीन चिकित्सा निकासी की सुविधा भी शामिल की जा सकती है।
वहीं पश्चिमी देशों से आने वाले मरीजों के मामले में भारत की मेडिकल कंपनियां उनके अपने देशों के स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के साथ साझेदारी कर इलाज को आगे जारी रखने की कोशिश कर रही हैं।
अंग प्रत्यारोपण जैसे मामलों में और बड़ी चुनौती
कुछ चिकित्सा प्रक्रियाएं ऐसी हैं, जिनमें सामान्य बीमा मॉडल को लागू करना आसान नहीं होता। अंग प्रत्यारोपण इसका एक प्रमुख उदाहरण है। ऐसे मामलों में भारतीय विशेषज्ञ मरीज के देश में मौजूद डॉक्टरों के साथ समन्वय करके सर्जरी से पहले और बाद की चिकित्सा देखभाल को बेहतर तरीके से संचालित करने की कोशिश करते हैं।
भारत का मेडिकल टूरिज्म अब केवल ‘सस्ता इलाज’ उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रह गया है। कम लागत के साथ बेहतर चिकित्सा सुविधाएं, आसान वीजा प्रक्रिया, मरीजों के लिए यात्रा संबंधी सहयोग, सुरक्षा, इलाज के बाद निगरानी और स्वस्थ होने तक सहायता जैसे पहलू भारत को वैश्विक चिकित्सा केंद्र के रूप में मजबूत कर रहे हैं। हालांकि विदेशी मरीजों का भरोसा बनाए रखने के लिए चिकित्सा गुणवत्ता, पारदर्शिता, सुरक्षा और लंबे समय तक इलाज के बाद की निगरानी जैसी चुनौतियों पर लगातार काम करना जरूरी होगा।





