ईरान-अमेरिका जंग के बीच समुद्री मोर्चे पर बड़ा तनाव, हूती हमले में 6 की मौत; होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान का सख्त रुख

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नई दिल्ली: ईरान-अमेरिका संघर्ष के बीच समुद्री इलाकों में तनाव और बढ़ गया है। यमन के हूती विद्रोहियों के हमले में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के पास एक वाणिज्यिक जहाज के चार चालक दल के सदस्यों की मौत हो गई। जहाज की मदद के लिए पहुंचे हूती विरोधी सैन्य समूह के दो यमनी बचावकर्मी भी मारे गए। ईरान युद्ध शुरू होने के बाद समुद्री जहाजों पर हूती हमले में इसे पहली बड़ी जानलेवा घटना बताया जा रहा है।

इसी बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। ईरान के वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी मोहसिन रेजाई ने कहा है कि जब तक अमेरिका उसकी शर्तों को स्वीकार नहीं करता, तब तक होर्मुज को जहाजों के आवागमन के लिए नहीं खोला जाएगा। ईरान ने अमेरिका से अपना रुख बदलने और विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों को जारी करने समेत अन्य शर्तें मानने की मांग की है।

बाब अल-मंदेब के पास मिस्र के जहाज को बनाया निशाना
यमन के परिवहन मंत्रालय के अनुसार, मिस्र के स्वामित्व वाले छोटे मालवाहक जहाज तिहामा को बाब अल-मंदेब के पास निशाना बनाया गया। हूती नियंत्रण वाले मीडिया की ओर से दावा किया गया कि हमले का लक्ष्य सऊदी अरब का एक जहाज था, जिस पर कथित तौर पर सैन्य उपकरण ले जाए जा रहे थे। बाब अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।

अमेरिका ने भी कार्गो जहाज पर की कार्रवाई
इसी दौरान अमेरिका की ओर से भी समुद्री मोर्चे पर कार्रवाई की गई। अमेरिकी सेना के मुताबिक, पनामा के झंडे वाला एक मालवाहक जहाज ईरानी बंदरगाहों पर लागू अमेरिकी नाकाबंदी का उल्लंघन कर रहा था। इसके बाद अमेरिकी नौसेना के एमएच-60 हेलिकॉप्टर ने जहाज पर दो हेलफायर मिसाइलें दागीं और उसके स्टीयरिंग सिस्टम को निष्क्रिय कर दिया। इस कार्रवाई में किसी के मारे जाने की जानकारी नहीं है।

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान ने बढ़ाई सख्ती
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अपना रुख और कड़ा कर दिया है। सुरक्षा परिषद से जुड़े मोहसिन रेजाई ने कहा कि अमेरिका के व्यवहार में बदलाव और ईरान की शर्तों को स्वीकार किए जाने तक यह रणनीतिक समुद्री मार्ग बंद रहेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में शामिल है। इस क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पहले से ही दबाव बना हुआ है।

 

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