‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, ट्रेन हादसे में मृत यात्री के परिवार को 8 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश
नई दिल्ली: ट्रेन हादसे में जान गंवाने वाले एक यात्री के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए रेलवे को मृतक के परिवार को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कानूनी दस्तावेजों में मृतक के लिए इस्तेमाल किए गए ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ शब्द पर भी कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि यह संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के पास हादसे के बाद टिकट बरामद नहीं होने मात्र से उसे वैध यात्री मानने से इनकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का भी महत्व होता है।
‘कोच सेकंड क्लास हो सकता है, यात्री नहीं’
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने 19 पन्नों के फैसले में कहा कि दस्तावेजों की समीक्षा के दौरान मृतक के लिए ‘सेकंड क्लास पैसेंजर’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने टिप्पणी की कि ‘क्लास’ शब्द यात्रा श्रेणी या कोच के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन किसी व्यक्ति की पहचान के रूप में नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारत के सामाजिक इतिहास और संवैधानिक मूल्यों को देखते हुए किसी व्यक्ति को इस तरह संबोधित करना उचित नहीं है। अदालत ने इस तरह की शब्दावली से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया।
2015 के ट्रेन हादसे से जुड़ा है मामला
यह मामला वर्ष 2015 का है। चंद्रकांत ठक्कर नामक व्यक्ति की चलती ट्रेन से गिरने के कारण मौत हो गई थी। हादसे के बाद उनकी पत्नी ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण में मुआवजे के लिए आवेदन किया, लेकिन यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया गया कि मृतक के पास से कोई वैध टिकट बरामद नहीं हुआ था।
इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी न्यायाधिकरण के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी थी।
पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में फैसले को दी चुनौती
मृतक की पत्नी ने हाईकोर्ट और रेलवे दावा न्यायाधिकरण के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। याचिका में 4 लाख रुपये मुआवजे के साथ 18 प्रतिशत ब्याज की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मृतक बिना टिकट यात्रा नहीं कर रहे थे। उनका टिकट बैग में रखा था, जो हादसे के बाद लापता हो गया और बरामद नहीं हो सका।
सुप्रीम कोर्ट ने पलटा निचली अदालतों का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए कहा कि शव के पास टिकट नहीं मिलने से किसी व्यक्ति का वैध यात्री होने का अधिकार स्वतः समाप्त नहीं हो जाता।
अदालत ने अपने पूर्व के रीना देवी और डोली रानी साहा बनाम भारत सरकार मामलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल टिकट नहीं मिलने के आधार पर मुआवजा रोकना न्यायसंगत नहीं है। इसी आधार पर रेलवे को मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया गया।
यात्रियों को सुरक्षा के प्रति भी किया आगाह
फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यात्रियों की सुरक्षा को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल रेलवे की नहीं, बल्कि यात्रियों की भी है।
कोर्ट ने कहा कि कई बार जल्दबाजी में ट्रेन पकड़ने या लापरवाही के कारण लोग अपनी जान जोखिम में डाल देते हैं। आर्थिक या अन्य व्यावहारिक कठिनाइयों के बावजूद प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सुरक्षा और जीवन को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।





