1170 साल पुराने प्राम्बानन शिव मंदिर के संरक्षण में भारत देगा तकनीकी सहयोग, इंडोनेशिया से सांस्कृतिक रिश्तों को मिलेगी नई मजबूती
नई दिल्ली: भारत और इंडोनेशिया के बीच हजारों वर्षों पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों को नई दिशा देने की पहल के तहत जावा द्वीप स्थित ऐतिहासिक प्राम्बानन मंदिर परिसर के संरक्षण और जीर्णोद्धार में भारत तकनीकी सहयोग प्रदान करेगा। लगभग 1170 वर्ष पुराने इस मंदिर को हिंदू स्थापत्य कला की उत्कृष्ट धरोहर माना जाता है। दोनों देशों के बीच यह सहयोग साझा सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
भगवान शिव को समर्पित है ऐतिहासिक मंदिर
इंडोनेशिया के योग्याकार्ता क्षेत्र के निकट स्थित प्राम्बानन मंदिर का निर्माण नौवीं शताब्दी में मातरम साम्राज्य के हिंदू संजय वंश के शासकों द्वारा कराया गया था। मंदिर परिसर का मुख्य आकर्षण भगवान शिव को समर्पित विशाल मंदिर है। इसके साथ भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा के मंदिर भी मौजूद हैं। पूरा परिसर त्रिमूर्ति की अवधारणा पर आधारित है और इसमें सैकड़ों छोटे-बड़े मंदिर शामिल हैं। मंदिर की दीवारों पर रामायण की कथा को बारीक शिल्पकला के माध्यम से उकेरा गया है, जिसे भारतीय सांस्कृतिक प्रभाव का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
समुद्री व्यापार से जुड़े भारत-इंडोनेशिया के प्राचीन संबंध
इतिहासकारों के अनुसार पहली शताब्दी से ही भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच समुद्री व्यापार सक्रिय था। भारतीय व्यापारी मसाले, वस्त्र और अन्य वस्तुओं के व्यापार के लिए इंडोनेशिया पहुंचते थे। इसी दौरान भारतीय संस्कृति, संस्कृत भाषा, धार्मिक परंपराएं, मंदिर निर्माण की कला तथा रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों का प्रभाव भी वहां पहुंचा। समय के साथ स्थानीय शासकों ने इन परंपराओं को अपनाया और हिंदू तथा बौद्ध संस्कृति वहां के सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई।
प्राकृतिक आपदाओं से हुआ था भारी नुकसान
प्राम्बानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 से 856 ईस्वी के बीच माना जाता है। बाद के वर्षों में ज्वालामुखी विस्फोट और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण मंदिर परिसर को भारी क्षति पहुंची और लंबे समय तक यह उपेक्षित रहा। बाद में पुरातात्विक अनुसंधानों के दौरान इसके ऐतिहासिक महत्व का पता चला, जिसके बाद मूल पत्थरों का उपयोग करते हुए वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और पुनर्निर्माण का कार्य शुरू किया गया।
यूनेस्को विश्व धरोहर के संरक्षण में भारत की भूमिका
वर्ष 1991 में प्राम्बानन मंदिर परिसर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया। अब भारत के तकनीकी सहयोग से परिसर के क्षतिग्रस्त छोटे मंदिरों के पुनर्स्थापन की योजना पर काम किया जाएगा। इस प्रक्रिया में मूल पत्थरों का अधिकतम उपयोग किया जाएगा ताकि मंदिर का ऐतिहासिक स्वरूप सुरक्षित रखा जा सके। आवश्यकता पड़ने पर आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से भी पत्थरों की मूल स्थिति का आकलन किया जाएगा।
सांस्कृतिक कूटनीति को मिलेगी नई ऊर्जा
इंडोनेशिया दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश है, लेकिन वहां आज भी प्राचीन हिंदू और बौद्ध विरासत को समान सम्मान दिया जाता है। विशेष रूप से बाली द्वीप पर हिंदू परंपराएं आज भी जीवंत रूप में मौजूद हैं। ऐसे में प्राम्बानन मंदिर के संरक्षण में भारत का सहयोग केवल एक पुरातात्विक परियोजना नहीं, बल्कि दोनों देशों के साझा इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और सभ्यतागत संबंधों को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। यह सहयोग आने वाली पीढ़ियों के लिए इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण में भी अहम भूमिका निभाएगा।





