H-1B पर ट्रंप प्रशासन की सख्ती का असर, भारतीय पेशेवरों के सामने जर्मनी-ब्रिटेन समेत दूसरे विकल्प
नई दिल्ली: अमेरिका में H-1B वीजा से जुड़े नियमों और शुल्क को लेकर अनिश्चितता के बीच भारतीय पेशेवरों और शोधकर्ताओं के लिए विदेश में करियर के विकल्प बदलते नजर आ रहे हैं। जर्मनी और ब्रिटेन जैसे देशों की ओर रुख करने के साथ कुछ पेशेवर भारत लौटने पर भी विचार कर रहे हैं। हालिया आंकड़े बताते हैं कि अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद देश से बाहर जाने वाले विदेशी भौतिकी पीएचडी धारकों का अनुपात भी तेजी से बढ़ा है।
अमेरिका छोड़ने वाले विदेशी पीएचडी धारकों की संख्या बढ़ी
अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स (AIP) के अनुसार, अमेरिका से भौतिकी में पीएचडी करने वाले गैर-अमेरिकी नागरिकों में डिग्री पूरी करने के बाद देश से बाहर रहने वालों का अनुपात 2023-24 में करीब 16% था, जो 2024-25 में बढ़कर 29% हो गया। AIP के मुताबिक यह पिछले 30 वर्षों में एक साल के अंतराल में दर्ज सबसे बड़ी बढ़ोतरी है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस बदलाव पर विज्ञान फंडिंग और वीजा नीतियों में हुए बदलावों का प्रभाव पड़ा है।
H-1B नियमों में 1 साल के लिए बढ़ाई गई सख्ती
ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में H-1B कार्यक्रम से जुड़े कुछ विदेशी कर्मचारियों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया था। 18 सितंबर 2026 की नई घोषणा में इस व्यवस्था को 12 महीने के लिए आगे बढ़ाया गया है। इसके तहत अमेरिका से बाहर मौजूद कुछ H-1B कर्मचारियों से जुड़ी याचिकाओं के साथ 1 लाख डॉलर का भुगतान आवश्यक है, हालांकि आदेश में राष्ट्रीय हित के आधार पर अपवाद का प्रावधान भी रखा गया है। यह विस्तारित प्रतिबंध 21 सितंबर 2027 तक लागू रहने के लिए तय किया गया है, जब तक इसे आगे नहीं बढ़ाया जाता।
भारतीय पेशेवरों के सामने जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकल्प
H-1B प्रक्रिया में बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारतीय पेशेवर अमेरिका के अलावा दूसरे देशों में अवसर तलाश रहे हैं। स्रोत में बताई गई एक भारतीय वैज्ञानिक को H-1B स्पॉन्सरशिप नहीं मिलने के बाद जर्मनी जाना पड़ा। वहीं इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मास्टर्स कर चुकी एक अन्य भारतीय पेशेवर ने H-1B के लिए तीन बार प्रयास करने के बाद ब्रिटेन का हाई-पोटेंशियल वीजा हासिल किया और लंदन में फिनटेक कंपनी में नौकरी शुरू की।
उनका कहना है कि करियर के सपने को किसी एक देश तक सीमित करने के बजाय अपनी क्षमताओं और लक्ष्यों से जोड़कर देखना चाहिए।
अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लेकर चिंता
अमेरिकी उच्च शिक्षा क्षेत्र में भी अंतरराष्ट्रीय छात्रों से जुड़े बदलाव दिखाई दे रहे हैं। AIP के अनुसार, वीजा और आव्रजन नीतियों में बदलाव तथा विज्ञान फंडिंग को लेकर अनिश्चितता ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों की भर्ती और आगे की योजनाओं को प्रभावित किया है। AIP की एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया है कि कई भौतिकी विभाग 2027 के लिए अंतरराष्ट्रीय छात्रों की भर्ती को पहले के स्तर पर बहाल करने को लेकर अनिश्चित हैं।
H-1B में भारतीयों की बड़ी हिस्सेदारी
स्रोत के अनुसार, H-1B कार्यक्रम में भारतीय पेशेवरों की हिस्सेदारी सबसे बड़ी है। दिए गए आंकड़ों में भारत से जुड़े H-1B लाभार्थियों की संख्या 2,83,772 और हिस्सेदारी 69.9% बताई गई है, जबकि चीन की हिस्सेदारी 12.1% और संख्या 49,161 है। अन्य देशों की हिस्सेदारी 18% बताई गई है।
नेशनल साइंस फाउंडेशन के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका के विज्ञान और इंजीनियरिंग कार्यबल में 22% लोग विदेशी मूल के हैं। मास्टर्स डिग्री धारकों में विदेशी मूल के लोगों की हिस्सेदारी 39% और पीएचडी धारकों में 46% बताई गई है। H-1B आवेदनों में 44.5% पेशेवर-तकनीकी सेवाओं, 12.1% मैन्युफैक्चरिंग, 9.9% आईटी और 9% वित्तीय क्षेत्र से जुड़े बताए गए हैं।
1 लाख डॉलर शुल्क से बढ़ी अनिश्चितता
H-1B वीजा को लेकर 1 लाख डॉलर के शुल्क की घोषणा ने कंपनियों और कर्मचारियों के बीच यात्रा तथा नौकरी से जुड़े फैसलों को प्रभावित किया। 2026 में अमेरिकी प्रशासन ने इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। मौजूदा आदेश के मुताबिक, अमेरिका से बाहर मौजूद कुछ H-1B कर्मचारियों के प्रवेश के लिए संबंधित याचिका के साथ 1 लाख डॉलर का भुगतान आवश्यक है, हालांकि राष्ट्रीय हित में अपवाद की व्यवस्था भी मौजूद है।
भारतीय प्रतिभाओं के लिए देश में अवसर
अमेरिका में वीजा और रोजगार से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच भारत लौटने वाले पेशेवरों के लिए देश में करियर और उद्यमिता के अवसर महत्वपूर्ण हो सकते हैं। भारतीय मूल के वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ पहले से ही स्टार्टअप, आईटी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अनुसंधान जैसे क्षेत्रों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में विदेश में बदलते अवसरों के बीच भारत भी इन पेशेवरों के लिए एक संभावित करियर विकल्प बन सकता है।





