NEET परीक्षा के बाद छात्रा की मौत से बढ़ी चिंता, परीक्षा तनाव और मानसिक स्वास्थ्य पर फिर उठे गंभीर सवाल

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नई दिल्ली: महाराष्ट्र के अहिल्यानगर जिले से सामने आई एक दुखद घटना ने प्रतियोगी परीक्षाओं के दबाव और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बार फिर गंभीर बहस छेड़ दी है। कर्जत तालुका के एक गांव में 19 वर्षीय छात्रा अंकिता सांगले की फांसी लगने से मौत हो गई। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, छात्रा NEET परीक्षा में अपेक्षा से कम अंक आने के बाद लंबे समय से मानसिक तनाव में थी। पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है और सभी पहलुओं की पड़ताल की जा रही है।

NEET विवाद के बीच सामने आई घटना

यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब राष्ट्रीय स्तर पर NEET परीक्षा, पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर चल रहा विवाद और विरोध प्रदर्शन हाल ही में थमा है। इस घटना ने एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मानसिक दबाव और विद्यार्थियों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक प्रभाव को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

166 अंक आने के बाद थी परेशान

प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, अंकिता सांगले ने इस वर्ष आयोजित NEET परीक्षा में 166 अंक प्राप्त किए थे। परिवार और परिचितों के अनुसार, उनका सपना डॉक्टर बनने का था, लेकिन अपेक्षा से कम अंक आने के बाद वह लगातार निराश और मानसिक तनाव में रहने लगी थीं। बताया गया कि पिछले कुछ समय से उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी।

घर लौटे परिजनों ने देखा दर्दनाक मंजर

घटना शनिवार दोपहर की बताई जा रही है। उस समय परिवार के अन्य सदस्य घर से बाहर गए हुए थे। जब वे वापस लौटे तो छात्रा को फंदे से लटका हुआ पाया। इसके बाद तत्काल पुलिस को सूचना दी गई। मौके पर पहुंची पुलिस ने आवश्यक कानूनी कार्रवाई पूरी कर शव को कब्जे में लिया और मामले की जांच शुरू कर दी।

हर पहलू से जांच कर रही है पुलिस

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की जांच सभी संभावित पहलुओं को ध्यान में रखकर की जा रही है। छात्रा की मानसिक स्थिति, परीक्षा परिणाम के बाद उसके व्यवहार में आए बदलाव और अन्य संभावित कारणों की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, जांच पूरी होने के बाद ही मौत के कारणों को लेकर अंतिम स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर फिर बढ़ी चिंता

इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे छात्र किस स्तर के मानसिक दबाव से गुजरते हैं। शिक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े विशेषज्ञ लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि परीक्षा के परिणाम को जीवन का अंतिम पैमाना नहीं माना जाना चाहिए। उनका मानना है कि छात्रों को समय पर भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक सहयोग उपलब्ध कराना परिवार, शिक्षण संस्थानों और समाज की साझा जिम्मेदारी है।

परीक्षा प्रणाली और परामर्श सेवाओं पर भी चर्चा तेज

घटना के बाद परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विभिन्न स्तरों पर परीक्षा व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद बनाने और विद्यार्थियों के लिए परामर्श सेवाओं को मजबूत करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है। शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी समान प्राथमिकता देना समय की जरूरत है।

 

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