हिमाचल में झील टूटने का बड़ा खतरा, 34 बस्तियों और अटल टनल पर मंडराया संकट
लाहौल : हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले में स्थित सिस्सू गांव और आसपास के क्षेत्रों में एक गंभीर प्राकृतिक खतरे ने चिंता बढ़ा दी है। अटल टनल के खुलने के बाद जहां इस इलाके में पर्यटन गतिविधियां तेज हुई हैं, वहीं 4,068 मीटर की ऊंचाई पर स्थित घेपन ग्लेशियर झील का लगातार बढ़ता आकार अब बड़े जोखिम की ओर इशारा कर रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह झील टूटती है तो सिस्सू गांव सहित पूरा क्षेत्र भारी तबाही की चपेट में आ सकता है, ठीक वैसी ही स्थिति जैसी 2013 में केदारनाथ आपदा के दौरान देखी गई थी।
पर्यटन बढ़ा, लेकिन खतरा भी गहराया
अटल टनल खुलने के बाद सिस्सू क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही तेजी से बढ़ी है। पहले जहां यह इलाका शांत और ग्रामीण जीवनशैली वाला था, वहीं अब यहां हर दिन हजारों वाहन पहुंच रहे हैं। पीक सीजन में यह संख्या 5000 तक पहुंच जाती है। इसी बीच नदी किनारे बोटिंग, जिपलाइन और ऑफ-रोड गतिविधियों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया है, लेकिन पहाड़ों की संवेदनशीलता को देखते हुए खतरा भी कई गुना बढ़ गया है।
तेजी से बढ़ रही घेपन झील
वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार घेपन ग्लेशियर झील का आकार लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 1989 में इसका क्षेत्रफल 36.49 हेक्टेयर था, जो 2022 तक बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया है। इस दौरान ग्लेशियर लगभग 2.76 किलोमीटर पीछे हट चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान और बारिश के कारण बर्फ के तेजी से पिघलने से यह स्थिति और गंभीर होती जा रही है।
बाढ़ का खतरा और संभावित तबाही
राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर की रिपोर्ट में इस झील को अत्यधिक संवेदनशील बताया गया है। वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार यदि झील टूटती है तो मात्र 21 मिनट के भीतर बाढ़ का पानी सिस्सू गांव तक पहुंच सकता है। पानी की रफ्तार 43 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। इस बाढ़ के साथ भारी मलबा, चट्टानें और ग्लेशियर के टुकड़े भी नीचे आ सकते हैं, जिससे 34 बस्तियां, 204 हेक्टेयर कृषि भूमि, 57 पुल और 106 किलोमीटर सड़कें प्रभावित हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों की चेतावनी और जलवायु परिवर्तन का असर
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालय क्षेत्र में तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिससे बारिश और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया तेज हो गई है। इससे ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं और नई झीलें बन रही हैं। घेपन ग्लेशियर हर साल औसतन 53 मीटर पीछे हट रहा है, जो स्थिति को और खतरनाक बना रहा है। यह एक ऐसी प्रक्रिया बन गई है जो लगातार तेज होती जा रही है।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इस क्षेत्र को संवेदनशील घोषित किया है। हालांकि कुछ स्थानों पर पायलट अलर्ट सिस्टम लगाए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर चेतावनी तंत्र, सायरन और सुरक्षित निकासी व्यवस्था अभी भी पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह खतरा बड़े संकट में बदल सकता है।
कुल मिलाकर, सिस्सू और आसपास का क्षेत्र एक ओर पर्यटन विकास का केंद्र बन रहा है, तो दूसरी ओर प्राकृतिक आपदा का बड़ा जोखिम भी सामने खड़ा है। यह स्थिति पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए गंभीर चेतावनी के रूप में देखी जा रही है।



