धर्म परिवर्तन के बाद OBC आरक्षण पर बड़ा झटका! हाईकोर्ट ने रद्द किया सरकारी आदेश, कहा- इस्लाम अपनाने पर नहीं मिलेगा पिछड़ा वर्ग का लाभ

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चेन्नई: धर्म परिवर्तन और आरक्षण के मुद्दे पर मद्रास हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए तमिलनाडु सरकार को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने उस सरकारी आदेश को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया, जिसके तहत हिंदू धर्म की पिछड़ी, अति-पिछड़ी या अनुसूचित जातियों से इस्लाम धर्म अपनाने वाले लोगों को ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम’ का दर्जा देकर आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था।

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी.बी. बालाजी की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि कोई भी व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करने के बाद केवल मुस्लिम होता है और वह केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में आरक्षण का दावा नहीं कर सकता।

याचिका से शुरू हुआ पूरा विवाद

यह मामला तमिलनाडु के थूथुकुडी जिले के निवासी समीर अहमद की याचिका से जुड़ा है। समीर अहमद का पहले नाम परमशिवम था और उनका जन्म एक हिंदू परिवार में हुआ था। वर्ष 2015 में उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार कर अपना नाम बदल लिया और मुस्लिम रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया।

धर्म परिवर्तन के बाद उन्होंने ‘मुस्लिम लेब्बाई’ समुदाय का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिए आवेदन किया था। तमिलनाडु में इस समुदाय को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल किया गया है। हालांकि तहसीलदार ने उनका आवेदन खारिज कर दिया, जिसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया।

सरकारी आदेश का दिया गया था हवाला

समीर अहमद ने अपनी याचिका में 9 मार्च 2024 को जारी तमिलनाडु सरकार के उस आदेश का उल्लेख किया, जिसमें धर्म परिवर्तन कर इस्लाम अपनाने वाले लोगों को आरक्षण का लाभ देने का प्रावधान किया गया था। राज्य सरकार ने अदालत में दलील दी कि ऐसे लोगों को उनकी पूर्व आरक्षित श्रेणी के लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।

हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी व्यक्ति को पिछड़ा वर्ग मुस्लिम श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम समुदायों को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मुस्लिम समाज में कई पारंपरिक समुदाय मौजूद हैं, लेकिन उनकी सदस्यता जन्म के आधार पर निर्धारित होती है। कोर्ट ने कहा कि जैसे हिंदू समाज में जातियां जन्म से तय होती हैं, उसी प्रकार राउथर, मरक्कयार या दक्कनी मुस्लिम जैसे समुदायों की पहचान भी जन्म से जुड़ी होती है।

खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के जरिए किसी विशेष मुस्लिम समुदाय का सदस्य घोषित करना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।

1951 के फैसले का भी लिया सहारा

मद्रास हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में वर्ष 1951 के एक महत्वपूर्ण मामले का हवाला देते हुए कहा कि जब कोई हिंदू इस्लाम स्वीकार करता है तो वह केवल मुस्लिम बनता है। मुस्लिम समाज में उसकी स्थिति उसकी पूर्व जातिगत पहचान के आधार पर निर्धारित नहीं होती।

अदालत ने कहा कि तमिलनाडु सरकार का आदेश संविधान की भावना और इस्लाम के मूल सिद्धांतों दोनों के विपरीत है।

आरक्षण जारी रखने के लिए अलग समूह नहीं बना सकती सरकार

फैसले में अदालत ने यह भी कहा कि वर्षों से ईसाई और इस्लाम धर्म के प्रचारकों द्वारा सामाजिक समानता को प्रमुख आधार बताया जाता रहा है। ऐसे में यह तर्क देना कि इस्लाम के भीतर भी ऊंच-नीच या सामाजिक विभाजन मौजूद है, उचित नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि इस्लाम समानता का संदेश देता है और सभी लोगों को बराबरी का दर्जा प्रदान करता है। इसलिए राज्य सरकार केवल आरक्षण का लाभ जारी रखने के उद्देश्य से धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों का अलग समूह बनाकर उन्हें विशेष श्रेणी में शामिल नहीं कर सकती।

क्या होगा फैसले का असर?

मद्रास हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद तमिलनाडु सरकार का वह आदेश प्रभावहीन हो गया है, जिसके तहत हिंदू धर्म से इस्लाम अपनाने वाले लोगों को ‘बैकवर्ड क्लास मुस्लिम’ श्रेणी में शामिल कर आरक्षण देने की व्यवस्था की गई थी। यह फैसला धर्म परिवर्तन, सामाजिक पहचान और आरक्षण नीति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ के रूप में देखा जा रहा है।

 

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