दुनिया में बढ़ रही लाल झाड़ी की चाय की दीवानगी, सिर्फ दक्षिण अफ्रीका में मिलता है पौधा; बदलता मौसम बना बड़ा खतरा

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नई दिल्ली: दक्षिण अफ्रीका के सेडरबर्ग पहाड़ों में उगने वाला रूइबोस पौधा इन दिनों दुनियाभर में तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। लाल रंग की इस झाड़ी की पत्तियों से तैयार होने वाली रूइबोस चाय को खास तौर पर कैफीन मुक्त होने के कारण पसंद किया जा रहा है। प्राकृतिक रूप से यह पौधा दक्षिण अफ्रीका के करीब 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में ही पाया जाता है। दुनिया के अन्य हिस्सों में इसकी खेती करना आसान नहीं है, क्योंकि इसे खास तरह की मिट्टी, कम बारिश और सूखे मौसम जैसी परिस्थितियों की जरूरत होती है।

रूइबोस का अर्थ ही ‘लाल झाड़ी’ होता है। यह पौधा दक्षिण अफ्रीका के सेडरबर्ग क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु के साथ इस तरह अनुकूलित है कि दूसरे देशों में बड़े पैमाने पर इसकी खेती चुनौतीपूर्ण मानी जाती है। इसी वजह से इसे एक स्थानिक पौधा कहा जाता है, यानी ऐसा पौधा जो प्राकृतिक रूप से किसी खास भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित रहता है। इसकी दुर्लभता और विशिष्ट पहचान अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग बढ़ा रही है।

50 से ज्यादा देशों में पहुंची रूइबोस चाय

रूइबोस से तैयार चाय की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है। यह पेय अब 50 से ज्यादा देशों में इस्तेमाल किया जा रहा है। 2022 से 2024 के बीच इसकी खपत में 12.5 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। वहीं 2025 में दक्षिण अफ्रीका से रूइबोस का निर्यात पहली बार 10 हजार टन के आंकड़े को पार कर गया।

जापान रूइबोस का सबसे बड़ा खरीदार बनकर सामने आया है। 2025 में दक्षिण अफ्रीका के कुल रूइबोस निर्यात का करीब 33 फीसदी हिस्सा जापान गया। इसके अलावा यूरोप और अमेरिका में भी इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

कैफीन मुक्त होने से बढ़ी मांग

रूइबोस की बढ़ती लोकप्रियता की एक बड़ी वजह इसमें कैफीन का नहीं होना है। ऐसे लोग जो कैफीन वाली चाय और कॉफी से बचना चाहते हैं, उनके लिए यह एक विकल्प के तौर पर उभर रही है।

रूइबोस में एंटीऑक्सीडेंट और पॉलीफेनॉल जैसे प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं। शुरुआती वैज्ञानिक अध्ययनों में इन तत्वों को स्वास्थ्य के लिए उपयोगी माना गया है। कुछ शोधों में इन्हें हृदय स्वास्थ्य और कुछ बीमारियों के जोखिम से भी जोड़ा गया है। हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक इन संभावित स्वास्थ्य लाभों की पुष्टि के लिए अभी और वैज्ञानिक अध्ययन की जरूरत है।

चाय के अलावा भी कई उत्पादों में इस्तेमाल

रूइबोस का उपयोग अब केवल चाय तक सीमित नहीं रह गया है। इससे विभिन्न प्रकार के हर्बल पेय, त्वचा की देखभाल से जुड़े उत्पाद और दूसरी उपभोक्ता वस्तुएं भी तैयार की जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती मांग के कारण दक्षिण अफ्रीका में इसकी खेती और व्यापार का महत्व भी बढ़ा है।

हालांकि, इसके सामने बदलते मौसम की चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। रूइबोस की खेती बारिश और तापमान जैसी प्राकृतिक परिस्थितियों पर काफी निर्भर करती है।

कम बारिश और बढ़ते तापमान से उत्पादन पर खतरा

पिछले दो दशकों में रूइबोस का उत्पादन लगभग 13 हजार से 25 हजार टन के बीच रहा है। वर्ष 2023 में कम बारिश के कारण इसकी फसल में करीब 17 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता तापमान और लगातार कम होती बारिश आने वाले समय में रूइबोस की खेती को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में वैश्विक बाजार में इसकी मांग बढ़ने के साथ-साथ इसके प्राकृतिक उत्पादन को बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।

रूइबोस की बढ़ती लोकप्रियता एक ऐसे पौधे की कहानी भी है, जो दुनिया के सीमित क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु पर निर्भर है। कैफीन मुक्त होने और अपने अलग स्वाद के कारण इसकी मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन जलवायु परिवर्तन इसके उत्पादन पर असर डाल सकता है। ऐसे में इसकी खेती और संरक्षण पर ध्यान देना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण होगा।

 

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