भारत की पहली LNG ट्रेन शुरू, डीजल की खपत में 40% तक कमी का दावा; जानें हाइड्रोजन ट्रेन से कितना अलग है सिस्टम
नई दिल्ली: भारतीय रेलवे ने अपनी पहली तरल प्राकृतिक गैस यानी LNG से चलने वाली ट्रेन शुरू कर दी है। पहली हाइड्रोजन ट्रेन शुरू होने के करीब 10 महीने बाद रेलवे की ओर से यह वैकल्पिक ईंधन तकनीक अपनाई गई है। रविवार को गृह मंत्री अमित शाह ने गुजरात के साबरमती स्टेशन से भारत की पहली LNG ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। इसे कार्बन उत्सर्जन घटाने और डीजल पर निर्भरता कम करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
LNG ट्रेन की शुरुआत के साथ 1500 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली कई रेलवे परियोजनाएं भी देश को समर्पित की गईं। इनमें रेलवे लाइनों के दोहरीकरण, कवच ट्रेन सुरक्षा प्रणाली, स्वचालित सिग्नलिंग और WAG-12 इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव के लिए रखरखाव शेड से जुड़े प्रोजेक्ट शामिल हैं।
डीजल और LNG दोनों से चलेगी ट्रेन
भारत की पहली LNG ट्रेन डुअल-फ्यूल तकनीक पर आधारित है। यानी जरूरत के मुताबिक इसमें LNG और डीजल दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तकनीक को ट्रेन की ड्राइविंग पावर कारों के लिए विकसित किया गया है।
साबरमती इंटीग्रेटेड कोचिंग डिपो में 1400 हॉर्सपावर क्षमता वाली दो ड्राइविंग पावर कारों को डुअल-फ्यूल तकनीक के लिए बदला गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तकनीक की कार्यक्षमता और विश्वसनीयता को वास्तविक परिस्थितियों में परखने के लिए इन दोनों बदली हुई ड्राइविंग पावर कारों का 2000 किलोमीटर से अधिक का फील्ड ट्रायल किया जा चुका है।
डीजल की खपत 40 प्रतिशत तक घटाने का लक्ष्य
डुअल-फ्यूल सिस्टम में LNG के इस्तेमाल से डीजल की खपत करीब 40 प्रतिशत तक कम की जा सकती है। रेलवे के ट्रायल डेटा के मुताबिक, इस तकनीक से ईंधन लागत के साथ कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे उत्सर्जन को भी कम करने में मदद मिल सकती है।
यह प्रणाली ईंधन की उपलब्धता के अनुसार ट्रेन को LNG या डीजल पर चलाने की सुविधा देती है। इससे ट्रेन किसी एक ईंधन स्रोत पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहती। तकनीक को इस तरह तैयार किया गया है कि डीजल की जगह LNG के इस्तेमाल के बावजूद पारंपरिक डीजल इंजन की पावर और काम करने की क्षमता बरकरार रहे।
हर संशोधित ड्राइविंग पावर कार में करीब 2200 लीटर क्षमता का LNG टैंक लगाया गया है। इसमें लगभग 850 से 900 किलोग्राम इस्तेमाल योग्य LNG भरी जा सकती है। एक पूरा टैंक ट्रेन को करीब 1600 किलोमीटर तक चलाने में मदद कर सकता है। भारतीय रेलवे का लक्ष्य नेट जीरो की दिशा में आगे बढ़ना है।
साबरमती-महेसाणा के बीच चल रही पहली LNG ट्रेन
पहली LNG-डीजल डुअल-फ्यूल डेमू ट्रेन साबरमती और महेसाणा जंक्शन के बीच चल रही है। यह आठ डिब्बों वाली गैर-वातानुकूलित चेयर कार ट्रेन है। हालांकि, इसका नियमित रूट अभी तय नहीं किया गया है। मार्ग की पुष्टि होने के बाद इसकी घोषणा की जाएगी।
हाइड्रोजन और LNG ट्रेन में क्या अंतर है?
हाइड्रोजन और LNG ट्रेन दोनों वैकल्पिक ईंधन तकनीक पर आधारित हैं, लेकिन इनके काम करने का तरीका अलग है। हाइड्रोजन ट्रेन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की मदद से फ्यूल सेल प्रणाली के जरिए ट्रेन के भीतर बिजली पैदा करती है।
इसके विपरीत LNG ट्रेन में आंतरिक दहन इंजन का इस्तेमाल होता है, जिसे LNG-डीजल डुअल-फ्यूल प्रणाली के लिए संशोधित किया गया है। इस व्यवस्था में LNG मौजूदा डीजल खपत को करीब 40 प्रतिशत तक कम करने में मदद कर सकती है।
आसान शब्दों में समझें तो हाइड्रोजन ट्रेन फ्यूल सेल आधारित प्रणोदन प्रणाली पर चलती है, जबकि LNG ट्रेन डीजल इंजन में वैकल्पिक ईंधन के रूप में LNG का इस्तेमाल करती है।
जुलाई में शुरू हुई थी भारत की पहली हाइड्रोजन ट्रेन
भारतीय रेलवे ने 17 जुलाई 2026 को हरियाणा के जींद और सोनीपत के बीच अपनी पहली हाइड्रोजन ट्रेन को हरी झंडी दिखाई थी। रेल मंत्रालय के अनुसार, इस ट्रेन ने 25 जुलाई तक 1200 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय की और 3200 लीटर से अधिक डीजल की बचत की।
पारंपरिक डीजल ट्रेन से अलग हाइड्रोजन ट्रेन हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया के जरिए ट्रेन के भीतर बिजली बनाती है। इस प्रक्रिया में जलवाष्प निकलती है और टेलपाइप से सीधे धुएं या कार्बन उत्सर्जन का दावा नहीं किया गया है।
इस ट्रेन में कुल 10 कोच हैं, जिनमें दो हाइड्रोजन ड्राइविंग पावर कारें शामिल हैं। ट्रेन की कुल क्षमता 2400 किलोवाट है। इसमें लिथियम आयरन फॉस्फेट बैटरी और हाइड्रोजन भंडारण सिलेंडर भी लगाए गए हैं।
पर्यावरण के लिहाज से हाइड्रोजन ट्रेन को अधिक स्वच्छ माना गया
दिए गए विवरण के अनुसार, पर्यावरण के लिहाज से हाइड्रोजन ट्रेन को LNG ट्रेन की तुलना में अधिक स्वच्छ माना जाता है। इसकी वजह यह है कि हाइड्रोजन ट्रेन में फ्यूल सेल प्रक्रिया के दौरान उप-उत्पाद के रूप में जलवाष्प निकलती है। वहीं LNG ट्रेन में आंतरिक दहन इंजन के जरिए ईंधन का इस्तेमाल होता है, हालांकि डुअल-फ्यूल तकनीक से डीजल की खपत और कुछ उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है।





