मेडिकेड पर मचा घमासान! ट्रंप प्रशासन के खिलाफ 25 राज्यों ने खोला मोर्चा, स्वास्थ्य बीमा नियम अदालत पहुंचा
नई दिल्ली : अमेरिका में सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजना मेडिकेड को लेकर बड़ा राजनीतिक और कानूनी विवाद खड़ा हो गया है। ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किए गए नए नियमों के खिलाफ 25 राज्यों और वॉशिंगटन डीसी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया है। राज्यों का आरोप है कि नए प्रावधानों से लाखों जरूरतमंद लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा हासिल करना मुश्किल हो सकता है और कई पात्र नागरिक भी योजना के लाभ से वंचित रह सकते हैं।
यह विवाद अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के तहत कार्यरत सेंटर्स फॉर मेडिकेयर एंड मेडिकेड सर्विसेज द्वारा जारी अंतरिम नियमों के बाद शुरू हुआ। मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का कहना है कि प्रशासन ने कानून की मूल भावना और दायरे से आगे जाकर ऐसे प्रावधान लागू किए हैं, जो लाभार्थियों पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं।
मेडिकेड लाभ के लिए अनिवार्य होगी कार्य गतिविधि
नए नियमों के मुताबिक 1 जनवरी से 19 से 64 वर्ष आयु वर्ग के उन लोगों को, जो मेडिकेड विस्तार योजना के तहत आते हैं, हर महीने कम से कम 80 घंटे काम करना होगा। इसके विकल्प के रूप में सामुदायिक सेवा या आधे समय तक पढ़ाई करना भी मान्य होगा।
हालांकि गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों, नशा मुक्ति कार्यक्रम में शामिल लोगों और कुछ विशेष श्रेणियों के लाभार्थियों को इन शर्तों से छूट देने का प्रावधान रखा गया है।
गंभीर बीमारी की नई परिभाषा पर सबसे ज्यादा विवाद
विवाद का सबसे बड़ा कारण गंभीर स्वास्थ्य स्थिति की नई परिभाषा बनी हुई है। पहले के प्रावधानों में विकलांगता, गंभीर बीमारी या नशे की लत से जूझ रहे लोगों को छूट मिलती थी। लेकिन नए नियमों के तहत बीमारी को तभी गंभीर माना जाएगा जब वह व्यक्ति की काम करने, पढ़ाई करने या सामुदायिक सेवा करने की क्षमता को काफी हद तक प्रभावित करती हो।
राज्यों का कहना है कि इस बदलाव से कैंसर मरीजों, दिव्यांगों, मानसिक रोगियों और अन्य गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों को अपनी पात्रता साबित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज और जटिल प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा।
हजारों लाभार्थियों के बाहर होने की आशंका
मुकदमा दायर करने वाले राज्यों का दावा है कि नई व्यवस्था के चलते कई पात्र लोग केवल तकनीकी और कागजी बाधाओं के कारण स्वास्थ्य बीमा कवरेज खो सकते हैं। उनका कहना है कि पात्रता सिद्ध करने की प्रक्रिया जितनी जटिल होगी, उतना ही अधिक जोखिम कमजोर और जरूरतमंद वर्गों पर पड़ेगा।
राज्यों ने यह भी आरोप लगाया कि लंबे समय तक विचार-विमर्श के बाद अचानक नियमों में बदलाव कर दिए गए, जिससे प्रशासनिक स्तर पर इन्हें लागू करना भी चुनौतीपूर्ण हो गया है।
ट्रंप प्रशासन ने बताई नियमों की जरूरत
दूसरी ओर ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि इन बदलावों का उद्देश्य सरकारी योजनाओं के दुरुपयोग को रोकना और यह सुनिश्चित करना है कि लाभ वास्तव में पात्र एवं जरूरतमंद लोगों तक ही पहुंचे।
हालांकि विवाद बढ़ने और मुकदमा दर्ज होने के बाद स्वास्थ्य विभाग तथा संबंधित एजेंसी की ओर से मामले पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने जताई चिंता
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने नए नियमों की आलोचना करते हुए कहा कि कैंसर, दिव्यांगता, मानसिक बीमारी या नशे की लत से उबर रहे लोगों को उपचार पाने के लिए अनावश्यक कागजी प्रक्रिया में नहीं फंसाया जाना चाहिए।
उन्होंने चेतावनी दी कि इन बदलावों का असर हजारों जरूरतमंद लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पर पड़ सकता है और इससे सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा।





