तेल सस्ता पड़ा, अब मानसून बना महंगाई का नया खतरा! बारिश में देरी से बढ़ सकती है महंगाई, RBI भी अलर्ट

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नई दिल्ली: कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने से महंगाई के मोर्चे पर कुछ राहत जरूर मिली है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने अब एक नई चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। कमजोर और देरी से पहुंचा मानसून आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई को बढ़ा सकता है, जिससे आम लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अल-नीनो के प्रभाव के कारण कम बारिश होने पर कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है और इसका सीधा असर खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा।

300 अरब डॉलर की कृषि अर्थव्यवस्था पर मंडरा रहा खतरा

दक्षिण-पश्चिम मानसून भारत की कृषि व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। देश में होने वाली कुल वार्षिक वर्षा का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा इसी मानसून से मिलता है। कृषि क्षेत्र, ग्रामीण मांग और उपभोक्ता खर्च पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बारिश सामान्य से कम रहती है तो फसल उत्पादन प्रभावित होगा, जिससे खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी आ सकती है।

ग्रामीण बाजार पर पड़ सकता है सीधा असर

एलएंडटी फाइनेंस से जुड़े अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कमजोर मानसून का असर सबसे पहले ग्रामीण अर्थव्यवस्था में दिखाई देता है। खाद की खरीद में कमी, ट्रैक्टर बुकिंग टलना, दोपहिया वाहनों की मांग घटना और त्योहारों से पहले व्यापारियों द्वारा कम स्टॉक रखना इसके शुरुआती संकेत माने जाते हैं। इसके बाद यह असर धीरे-धीरे खपत और आर्थिक विकास दर तक पहुंच सकता है।

महंगाई पर RBI की पैनी नजर

भारतीय रिजर्व बैंक भी मौसम की स्थिति पर लगातार निगरानी बनाए हुए है। केंद्रीय बैंक ने हाल ही में अपनी प्रमुख ब्याज दर 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखी है और महंगाई को लक्ष्य सीमा के भीतर मानते हुए तटस्थ रुख अपनाया है। हालांकि अधिकारियों का कहना है कि यदि खाद्य कीमतों में दबाव बढ़ता है तो आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।

10% कम बारिश बढ़ा सकती है महंगाई

क्वांटइको रिसर्च की एक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक, यदि बारिश में 10 प्रतिशत की कमी आती है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण उपभोक्ता महंगाई दर में एक प्रतिशत तक इजाफा हो सकता है। 22 जून तक देशभर में दर्ज बारिश सामान्य स्तर से 43 प्रतिशत कम रही थी, जिसने चिंता बढ़ा दी है।

अनाज का भंडार राहत दे सकता है, लेकिन पूरी सुरक्षा नहीं

विशेषज्ञों का मानना है कि देश के पास गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार मौजूद है, जो अल्पकालिक राहत दे सकता है। हालांकि दालों, तिलहनों और मोटे अनाज के मामले में स्थिति अलग है। इन फसलों का उत्पादन प्रभावित होने पर खाद्य महंगाई को नियंत्रित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

अल-नीनो का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अल-नीनो वैश्विक कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। भारत खाद्य तेलों के लिए दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों पर निर्भर है। यदि वहां भी बारिश कम हुई तो आयातित खाद्य तेलों की कीमतों में बढ़ोतरी का असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिल सकता है।

अक्टूबर तक 5.5% पहुंच सकती है महंगाई

विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि बारिश की स्थिति नहीं सुधरी तो अक्टूबर तक खुदरा महंगाई दर 5.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह केंद्रीय बैंक के निर्धारित लक्ष्य दायरे की ऊपरी सीमा के बेहद करीब होगी। ऐसी स्थिति में ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।

सरकार ने शुरू की तैयारी

संभावित संकट से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने कम वर्षा वाले 315 जिलों की पहचान की है। इनमें 111 ऐसे जिले शामिल हैं जहां सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं। सरकार फसल चयन, जल प्रबंधन और आपातकालीन कृषि योजनाओं पर राज्यों के साथ मिलकर काम कर रही है ताकि किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर को कम किया जा सके।

 

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