ब्रिटेन ने माना भारत का चिकित्सा गौरव! महर्षि सुश्रुत को मिला ऐतिहासिक सम्मान, रॉयल कॉलेज में स्थापित हुई प्रतिमा

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लंदन: भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा और आयुर्वेदिक ज्ञान को वैश्विक स्तर पर बड़ी मान्यता मिली है। ब्रिटेन के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग ने अपने परिसर में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापित कर उन्हें सम्मानित किया है। इस कदम को केवल एक प्रतिमा स्थापना नहीं, बल्कि विश्व चिकित्सा इतिहास में भारत के योगदान की औपचारिक स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है।

लंबे समय तक सर्जरी के इतिहास को मुख्य रूप से यूरोप, ग्रीस और रोम की देन के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन अब दुनिया की प्रमुख सर्जिकल संस्थाओं में शामिल यह कॉलेज स्वीकार कर रहा है कि शल्य चिकित्सा के विकास में भारत की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित सर्जिकल संस्थानों में शामिल है यह कॉलेज

रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग की स्थापना वर्ष 1505 में हुई थी। आज इसके 140 से अधिक देशों में 33 हजार से ज्यादा सदस्य हैं। चिकित्सा और शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में यह संस्थान वैश्विक स्तर पर अत्यंत प्रतिष्ठित माना जाता है।

ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान द्वारा महर्षि सुश्रुत को सम्मानित किया जाना भारत की प्राचीन वैज्ञानिक और चिकित्सकीय विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

2600 साल पहले रखी थी आधुनिक सर्जरी की नींव

इतिहासकारों और चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, लगभग 2600 वर्ष पहले महर्षि सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसे सिद्धांत और तकनीकें विकसित की थीं, जिन्हें आधुनिक सर्जरी की आधारशिला माना जाता है।

उन्होंने 300 से अधिक प्रकार की शल्य प्रक्रियाओं और 124 सर्जिकल उपकरणों का विस्तृत वर्णन किया था। विशेष रूप से पुनर्निर्माण शल्य चिकित्सा यानी प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र में उनके योगदान को विश्वभर में सराहा जाता है।

उनके चिकित्सा ज्ञान का विस्तृत विवरण ‘सुश्रुत संहिता’ में मिलता है, जिसे सर्जरी पर दुनिया के सबसे प्राचीन और व्यवस्थित ग्रंथों में गिना जाता है।

चिकित्सा नैतिकता के सिद्धांत भी दिए थे महर्षि सुश्रुत ने

नई शोध और प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, महर्षि सुश्रुत ने चिकित्सा नैतिकता, चिकित्सकीय अनुशासन और रोगी देखभाल से जुड़े सिद्धांतों की स्थापना उस दौर में की थी, जब दुनिया के कई हिस्सों में संगठित चिकित्सा व्यवस्था भी विकसित नहीं हुई थी।

विशेषज्ञों का मानना है कि चिकित्सा क्षेत्र में नैतिक मूल्यों और पेशेवर आचरण की जो अवधारणाएं आज महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, उनके कई प्रारंभिक स्वरूप भारतीय चिकित्सा परंपरा में पहले से मौजूद थे।

भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को वैश्विक पहचान

महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा स्थापना को भारत की वैज्ञानिक, चिकित्सकीय और सांस्कृतिक विरासत के प्रति बढ़ते वैश्विक सम्मान के रूप में देखा जा रहा है। यह कदम न केवल भारतीय चिकित्सा इतिहास को नई पहचान देता है, बल्कि दुनिया को यह भी याद दिलाता है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कई महत्वपूर्ण नींव प्राचीन भारत में रखी गई थीं।

 

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