400 करोड़ से 2600 करोड़! ध्रुवीय अनुसंधान पोत की कीमत में भारी उछाल, सरकार ने अब 2689 करोड़ रुपये किए मंजूर

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नई दिल्ली: भारत के ध्रुवीय अनुसंधान अभियान को मजबूती देने के लिए प्रस्तावित ध्रुवीय अनुसंधान पोत की खरीद का रास्ता अब साफ हो गया है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने मंगलवार को बताया कि वित्त मंत्रालय ने पोत की खरीद के लिए 2689 करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी है। इसके साथ ही पोत की खरीद की आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। यह जहाज अंटार्कटिक महाद्वीप में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

जिस पोत की शुरुआती अनुमानित लागत करीब 400 करोड़ रुपये बताई गई थी, उसकी कीमत अब बढ़कर करीब 2600 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि लागत में यह बढ़ोतरी केवल प्रशासनिक देरी के कारण नहीं हुई है। मंत्रालय के मुताबिक कई अपरिहार्य, अनजाने और वैध बाहरी परिस्थितियों के कारण परियोजना की लागत में इजाफा हुआ।

2010 में 490 करोड़ की मिली थी मंजूरी

मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2010 में आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने ध्रुवीय अनुसंधान पोत के लिए 490 करोड़ रुपये मंजूर किए थे। इसके बाद पोत की खरीद की प्रक्रिया शुरू की गई। वर्ष 2013 में शुरुआती निविदा प्रक्रिया के दौरान सबसे कम बोली लगाने वाले पक्ष की लागत भी स्वीकृत बजट से अधिक निकली।

इसके बाद लागत समिति ने परियोजना की संशोधित लागत 1051 करोड़ रुपये करने की सिफारिश की। सरकार ने वर्ष 2014 में इस संशोधित लागत को मंजूरी दे दी। आशय पत्र जारी होने के बाद पोत निर्माता ने निविदा की कुछ शर्तों में बदलाव की मांग रखी, लेकिन सरकार को ये बदलाव स्वीकार्य नहीं थे। इसके चलते आगे की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

बाजार कीमत के आधार पर फिर हुआ लागत का आकलन

बदलती बाजार परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय समुद्री विश्वविद्यालय को पोत की मौजूदा लागत का आकलन करने की जिम्मेदारी दी गई। विश्वविद्यालय ने पोत की संशोधित आधार लागत 264 मिलियन अमेरिकी डॉलर निर्धारित करने की सिफारिश की, जिसे स्वीकार कर लिया गया। इसके अलावा चिन्हित आवश्यकताओं के लिए 20 प्रतिशत अतिरिक्त राशि भी लागत में शामिल की गई।

क्यों जरूरी है भारत का अपना ध्रुवीय पोत

भारत अब तक अंटार्कटिका और अन्य ध्रुवीय अभियानों के लिए बड़े पैमाने पर किराए पर लिए गए आइस-क्लास जहाजों पर निर्भर रहा है। इन जहाजों के जरिए वैज्ञानिकों, अनुसंधान उपकरणों और जरूरी सामान को ध्रुवीय क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है। अपना अनुसंधान पोत होने से किराए के जहाजों पर निर्भरता कम होगी और ध्रुवीय अभियानों की योजना बनाने तथा वैज्ञानिक गतिविधियों को अधिक लचीले तरीके से संचालित करने में मदद मिलेगी।

सिर्फ सामान ढोने वाला जहाज नहीं होगा पीआरवी

प्रस्तावित ध्रुवीय अनुसंधान पोत को वैज्ञानिक अनुसंधान की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाएगा। इसमें अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ ध्रुवीय परिस्थितियों में काम करने की क्षमता होगी। आइस-ब्रेकिंग सुविधा के कारण समुद्री बर्फ वाले क्षेत्रों में भी जहाज आगे बढ़ सकेगा।

पोत में वैज्ञानिकों और सहयोगी कर्मचारियों के लिए विशेष आवास, हेलीडेक और भारी उपकरणों को उठाने तथा संभालने के लिए क्रेन जैसी सुविधाएं भी प्रस्तावित हैं। यानी इसका इस्तेमाल केवल वैज्ञानिकों और सामान की आवाजाही तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ध्रुवीय क्षेत्रों में अनुसंधान अभियानों के लिए इसे एक समर्पित मंच के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा।

जलवायु और मानसून के अध्ययन में भी अहम भूमिका

ध्रुवीय अनुसंधान पोत की जरूरत केवल अंटार्कटिका तक वैज्ञानिक पहुंच बढ़ाने के लिहाज से नहीं है। इसका संबंध जलवायु परिवर्तन और मानसून से जुड़े अध्ययन से भी है। संसदीय समिति के अनुसार ध्रुवीय क्षेत्रों में होने वाले बदलाव वैश्विक जलवायु व्यवस्था, समुद्री धाराओं, समुद्र के स्तर और मौसम के स्वरूप को प्रभावित करते हैं।

समिति ने भारत के पास अपने आइस-क्लास पोत नहीं होने को ध्रुवीय अनुसंधान के विस्तार में बड़ी बाधा बताया है। ऐसे में प्रस्तावित पोत भारत की ध्रुवीय अनुसंधान क्षमता को बढ़ाने के साथ वैज्ञानिक अभियानों को अधिक स्वतंत्र और व्यवस्थित तरीके से संचालित करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

 

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