भारत में गरीबी के खिलाफ बड़ी सफलता, 12 साल में 49.6 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर; 2028 तक और घट सकती है दर

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नई दिल्ली: भारत ने गरीबी कम करने की दिशा में पिछले 12 वर्षों के दौरान बड़ी प्रगति की है। विश्व बैंक की अक्टूबर 2026 में जारी रिपोर्ट के मुताबिक, 2011 से 2023 के बीच देश में अत्यधिक गरीबी की दर में तेजी से गिरावट आई है। वर्ष 2011 में भारत की 27.1 फीसदी आबादी अत्यधिक गरीब थी, जबकि 2023 में यह आंकड़ा घटकर 2.6 फीसदी रह गया। हालांकि, प्रति व्यक्ति आय के मामले में अभी सुधार की गुंजाइश बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में भी करीब 7.5 करोड़ लोगों की रोजाना की आमदनी 3 डॉलर से कम थी।

12 साल में 49.6 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए

विश्व बैंक ने गरीबी का आकलन करने के लिए दो आय मानक अपनाए हैं। पहला मानक रोजाना 3 डॉलर की आय है, जिसके आधार पर अत्यधिक गरीबी मापी जाती है। यह सीमा 2021 की परचेजिंग पावर पैरिटी यानी अलग-अलग देशों में वस्तुओं की कीमतों और खरीदने की क्षमता के आधार पर तय की गई है।

दूसरा मानक रोजाना 4.20 डॉलर की आय है। विश्व बैंक निम्न-मध्यम आय वाले भारत जैसे देशों में गरीबी का आकलन करने के लिए इस सीमा का इस्तेमाल करता है। इस मानक के अनुसार, भारत में गरीबी की दर 2011 में 57.7 फीसदी थी, जो 2023 में घटकर 16.1 फीसदी रह गई। इस अवधि में करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए।

गरीबी घटने के पीछे ये तीन बड़ी वजहें

विश्व बैंक ने गरीबी में कमी के पीछे तीन प्रमुख कारण बताए हैं। इनमें घरेलू खर्च और खपत में बढ़ोतरी, रोजगार के अवसरों का विस्तार और सरकारी योजनाओं का ज्यादा लोगों तक पहुंचना शामिल है। मुफ्त राशन और अन्य सब्सिडी योजनाओं ने भी इसमें भूमिका निभाई।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2017 से 2023 के बीच भारत में करीब 13.4 करोड़ नए रोजगार जुड़े। यह संख्या इस अवधि में कामकाजी उम्र की आबादी में हुई बढ़ोतरी से लगभग दोगुनी थी। रोजगार के अवसर बढ़ने से परिवारों की आमदनी में इजाफा हुआ और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार आया।

ग्रामीण महिलाओं की बढ़ती भागीदारी से बदली तस्वीर

गरीबी कम करने में ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक गतिविधियों में बढ़ती भागीदारी भी अहम रही। बड़ी संख्या में महिलाएं आय अर्जित करने वाले कामों से जुड़ीं। इससे परिवारों में कमाने वाले सदस्यों की संख्या बढ़ी और घरेलू आमदनी को सहारा मिला।

विश्व बैंक के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी घटने की रफ्तार शहरों की तुलना में तेज रही है। इससे गांव और शहर के बीच गरीबी का अंतर भी कम हुआ है। हालांकि, ग्रामीण भारत में अब भी गरीबी की समस्या ज्यादा है। वर्ष 2023 के आंकड़ों के मुताबिक, रोजाना 4.20 डॉलर की आय के मानक पर ग्रामीण क्षेत्रों में 19.3 फीसदी लोग गरीब थे, जबकि शहरी इलाकों में यह दर 8.6 फीसदी थी।

यूपी से पश्चिम बंगाल तक के राज्यों में गरीबों की बड़ी आबादी

देश में गरीबी की दर घटने के बावजूद अब यह समस्या कुछ राज्यों और क्षेत्रों में अधिक केंद्रित हो गई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के करीब 57 फीसदी गरीब उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैले क्षेत्र में रहते हैं। इस क्षेत्र में बिहार, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्य भी शामिल हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले समय में गरीबी कम करने के प्रयासों में इन राज्यों की भूमिका अहम होगी। इन क्षेत्रों में ऐसे रोजगार के अवसर पैदा करने की जरूरत है, जिनसे लोगों को काम मिलने के साथ बेहतर आमदनी भी हो सके।

शिक्षा का स्तर भी गरीबी से जुड़ा

विश्व बैंक की रिपोर्ट में शिक्षा और गरीबी के बीच संबंध की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। जिन वयस्कों ने कभी औपचारिक शिक्षा नहीं ली, उनमें गरीबी की दर 21.3 फीसदी थी। इसके मुकाबले कॉलेज या उससे आगे की पढ़ाई करने वालों में यह दर 7.4 फीसदी रही।

बच्चों पर भी गरीबी का असर ज्यादा दिखाई दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, 0 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों में गरीबी की दर 21.8 फीसदी रही, जो सभी आयु वर्गों में सबसे अधिक थी। इसके अलावा, देश की 29.6 फीसदी आबादी को बुनियादी स्वच्छता सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। वहीं, 13.8 फीसदी लोगों के घर में किसी भी वयस्क ने प्राथमिक शिक्षा पूरी नहीं की थी।

रोजगार बढ़ा, लेकिन अच्छी कमाई अब भी चुनौती

विश्व बैंक ने रोजगार के अवसरों में बढ़ोतरी को गरीबी कम होने की अहम वजह माना है, लेकिन नौकरियों की गुणवत्ता को लेकर चिंता भी जताई है। रिपोर्ट के अनुसार, रोजगार में हुई बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा ऐसे कामों से आया, जिनमें कम आमदनी होती है और उत्पादकता भी कम रहती है।

महंगाई के असर को हटाकर आंकी जाने वाली वास्तविक कमाई में भी इस दौरान खास बढ़ोतरी नहीं हुई। युवाओं के लिए रोजगार की चुनौती अब भी बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 और वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के बीच युवा बेरोजगारी दर 14.6 फीसदी से बढ़कर 15.9 फीसदी हो गई। इस बढ़ोतरी का असर ग्रामीण क्षेत्रों की युवा महिलाओं पर ज्यादा पड़ा।

अमीर और गरीब के बीच आय का अंतर बरकरार

गरीबी घटने के बावजूद देश में आर्थिक असमानता एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में सबसे ज्यादा कमाई करने वाले 10 फीसदी कामगारों की औसत आय सबसे कम कमाई करने वाले 10 फीसदी कामगारों की तुलना में करीब 13 गुना थी।

इस अंतर को इस तरह समझा जा सकता है कि अगर सबसे कम कमाने वाले वर्ग के किसी कामगार की आय 1,000 रुपये है, तो सबसे ज्यादा कमाने वाले वर्ग के कामगार की आय करीब 13,000 रुपये होगी। यह दोनों समूहों के बीच कमाई के बड़े अंतर को दिखाता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घरेलू सर्वेक्षणों में अमीर परिवारों की खपत का पूरा ब्योरा दर्ज करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे में देश में अमीर और गरीब के बीच वास्तविक असमानता रिपोर्ट में दर्ज आंकड़ों से भी अधिक हो सकती है। गरीबी कम करने के साथ-साथ लोगों की आय बढ़ाना और आर्थिक असमानता घटाना भी बड़ी चुनौती है।

2028 तक 12.1 फीसदी रह सकती है गरीबी दर

विश्व बैंक का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में भारत में गरीबी का स्तर और कम हो सकता है, हालांकि इसकी रफ्तार पहले के मुकाबले धीमी रहने की संभावना है। रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, रोजाना 4.20 डॉलर की आय के मानक पर गरीबी दर 2026 में 14.2 फीसदी से घटकर 2028 तक 12.1 फीसदी रह सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 12 वर्षों में गरीबी कम करने के मामले में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। अब आगे की चुनौती ऐसे गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध कराने की है, जिनसे लोगों की आय लगातार बढ़े और उनकी खरीदने की क्षमता में सुधार हो। इसके लिए खासतौर पर उन राज्यों और ग्रामीण क्षेत्रों पर ध्यान देने की जरूरत होगी, जहां आज भी बड़ी आबादी गरीबी से जूझ रही है।

 

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