जापान की पहली पसंद भारत, फिर भी थाईलैंड में क्यों ज्यादा हैं जापानी कारखाने? अब बदलेगी रणनीति
टोक्यो: जापानी कंपनियों के लिए भारत निवेश के लिहाज से लगातार पसंदीदा देशों में बना हुआ है, लेकिन विनिर्माण संयंत्रों की संख्या के मामले में थाईलैंड भारत से काफी आगे है। जापानी कंपनियों के बीच भारत को 61.8 प्रतिशत समर्थन मिला है और वह लगातार चौथे साल पसंदीदा निवेश ठिकानों की सूची में शीर्ष पर है। इसके बावजूद भारत में करीब 1,400 जापानी कंपनियां हैं, जबकि थाईलैंड में यह संख्या करीब 6,000 है।
भारत ने पिछले 11 वर्षों में जापान से निवेश का लक्ष्य 3.5 लाख करोड़ येन यानी करीब 2.10 लाख करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10 लाख करोड़ येन यानी करीब 6 लाख करोड़ रुपये किया है। हालांकि कंपनियों की संख्या में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई। अब भारत ने निवेश आकर्षित करने के लिए अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए करीब 220 भारतीय उद्योगपतियों को जापान ले जाने की पहल की है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के नेतृत्व वाला भारतीय प्रतिनिधिमंडल 24 से 27 अगस्त तक जापान के दौरे पर रहेगा।
जापान की मझोली कंपनियों पर भारत की नजर
जापान की विनिर्माण क्षमता में आइची और कंसाई जैसे औद्योगिक क्षेत्रों की हजारों मझोली कंपनियों की बड़ी भूमिका है। ये कंपनियां बड़ी जापानी कंपनियों को कलपुर्जे और अन्य जरूरी सामान उपलब्ध कराती हैं। जापानी कंपनियां जब विदेशों में विस्तार करती हैं तो उनके साथ आपूर्तिकर्ता कंपनियां भी जाती हैं। भारत अब इसी कारोबारी तंत्र को ध्यान में रखते हुए जापानी कंपनियों तक सीधे पहुंच बनाने की कोशिश कर रहा है।
भारतीय प्रतिनिधिमंडल नागोया में चुकेइरेन और नागोया चैंबर के साथ रोड शो करेगा। इसके अलावा ओसाका और क्योटो में क्षेत्रीय उद्योगों के साथ भी बातचीत की जाएगी। इसका उद्देश्य जापानी उद्योगों को भारत में निवेश और विनिर्माण के अवसरों से जोड़ना है।
सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और एआई पर होगी चर्चा
दौरे के दौरान सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में गोलमेज बैठक आयोजित की जाएगी। इसके अलावा पूंजीगत वस्तुओं, मशीनरी और वाहन उद्योग से जुड़े मुद्दों पर भी चर्चा होगी। भारत और जापान के बीच दोतरफा निवेश बढ़ाना इस दौरे का प्रमुख उद्देश्य है।
भारत की कंपनियां भी जापान में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। फिलहाल जापान में करीब 100 भारतीय कंपनियां मौजूद हैं। ऐसे में भारतीय पक्ष का जोर दोनों देशों के बीच निवेश को एकतरफा न रखकर दोतरफा कारोबारी संबंधों को मजबूत करने पर है।
भारत सिर्फ जापानी निवेश का इंतजार नहीं कर रहा
भारतीय प्रतिनिधिमंडल में ऐसे कारोबारी भी शामिल हैं जो जापानी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए सीधे अवसर दिखा सकते हैं। रिलायंस के औद्योगिक नगर मेट सिटी के प्रतिनिधि जापानी कंपनियों के लिए भारत में जमीन और औद्योगिक सुविधाओं से जुड़े अवसर सामने रखेंगे। मारुति सुजुकी, गुजरात राज्य उर्वरक एवं रसायन, बीमा और संपत्ति प्रबंधन क्षेत्र की कंपनियां भी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा हैं।
इन कंपनियों की नजर जापान की पेंशन पूंजी और निवेश के अन्य अवसरों पर भी है। इसके साथ ही भारतीय स्टार्टअप कंपनियों के लिए टोक्यो में अलग बैठक आयोजित की जाएगी, ताकि तकनीकी और नए कारोबारी क्षेत्रों में सहयोग की संभावनाएं तलाश सकें।
वाहन से लेकर तकनीक और स्टार्टअप तक कई क्षेत्र शामिल
प्रतिनिधिमंडल में आरपीजी समूह के उपाध्यक्ष अनंत गोयनका, एसोचैम से निर्मल कुमार मिंडा, टीसीआई के विनीत अग्रवाल, रिन्यू पावर के सुमंत सिन्हा, किर्लोस्कर सिस्टम्स की गीतांजलि विक्रम किर्लोस्कर, एडवर्ब टेक के जलज दानी और कार्स24 के विक्रम चोपड़ा शामिल हैं।
इसके अलावा गुजरात राज्य उर्वरक एवं रसायन के राजेंद्र कुमार, मारुति सुजुकी के राहुल भारती, मोबिक्विक की उपासना टाकू, न्यूस्पेस रिसर्च के जूलियस अमृत, निप्पॉन लाइफ इंडिया एसेट मैनेजमेंट के संदीप सिक्का, रिलायंस मेट सिटी के श्रीवल्लभ गोयल, स्नैबिट के आयुष अग्रवाल, स्टार यूनियन दाई-इची लाइफ के अभय तिवारी और एसपीएफ की श्वेता राजपाल कोहली भी प्रतिनिधिमंडल में हैं।
प्रतिनिधिमंडल में वाहन, वाहन कलपुर्जे, अभियांत्रिकी, रसायन, पेट्रो रसायन, तकनीक और स्टार्टअप जैसे अलग-अलग क्षेत्रों की कंपनियों को शामिल किया गया है। भारत की कोशिश है कि जापान में मौजूद निवेश क्षमता को भारतीय विनिर्माण क्षेत्र तक पहुंचाया जाए और जापानी कंपनियों की भारत में मौजूदगी को संख्या के साथ-साथ उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला के स्तर पर भी मजबूत किया जाए।





