‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरला स्टोरी’ का हवाला देकर ‘सतलुज’ के लेखक ने उठाए सवाल, फिल्म हटाने पर मांगी जवाबदेही
नई दिल्ली: अभिनेता दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद विवाद और तेज हो गया है। फिल्म के सह-लेखक निरेन भट्ट ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी फिल्म पर आपत्ति है तो उसके पीछे के कारणों को स्पष्ट रूप से सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि किसी रचनात्मक कृति को बिना विस्तृत वजह बताए हटाना स्वस्थ संवाद की भावना के अनुरूप नहीं है।
निरेन भट्ट ने कहा कि पूरी प्रक्रिया के दौरान सबसे बड़ी कमी संवाद की रही। उनके मुताबिक यदि फिल्म के किसी दृश्य, विषय या प्रस्तुति को लेकर आपत्ति थी तो संबंधित पक्षों के साथ चर्चा की जानी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि रचनाकारों को यह जानने का अधिकार है कि किन कारणों से उनकी फिल्म पर सवाल उठाए गए और किन हिस्सों में बदलाव की अपेक्षा की गई। उनका मानना है कि पारदर्शी संवाद से कई विवादों का समाधान निकाला जा सकता है।
‘द कश्मीर फाइल्स’ और ‘द केरला स्टोरी’ का दिया उदाहरण
फिल्म हटाए जाने के मुद्दे पर निरेन भट्ट ने अन्य चर्चित फिल्मों का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि जब संवेदनशील विषयों पर आधारित दूसरी फिल्में दर्शकों तक पहुंच सकती हैं तो फिर केवल एक फिल्म को अलग नजरिए से देखना उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि किसी संभावित आशंका के आधार पर किसी फिल्म के प्रदर्शन को प्रभावित करना कितना उचित है। उनके अनुसार ऐसे हर फैसले के पीछे स्पष्ट और पारदर्शी प्रक्रिया होनी चाहिए।
जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन से प्रेरित बताई जाती है कहानी
‘सतलुज’ की कहानी समाजसेवी जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन से प्रेरित बताई जाती है। फिल्म में उन घटनाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है, जिनमें उन्होंने कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और संदिग्ध मामलों की जांच को लेकर आवाज उठाई थी। कहानी एक ऐसे व्यक्ति के संघर्ष को सामने लाती है जिसने संवेदनशील मुद्दों पर सवाल उठाए और बाद में रहस्यमय परिस्थितियों का सामना किया। इसी विषयवस्तु के कारण फिल्म शुरुआत से ही चर्चा में बनी रही।
पहले ‘पंजाब 95’ था फिल्म का नाम
इस फिल्म का नाम पहले ‘पंजाब 95’ रखा गया था, जिसे बाद में बदलकर ‘सतलुज’ कर दिया गया। नाम बदलने के बाद भी फिल्म को लेकर विवाद और चर्चाएं जारी रहीं। अब ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने के बाद अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, रचनात्मक आजादी और फिल्म प्रमाणन प्रक्रिया को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।
पारदर्शिता और संवाद की उठी मांग
फिल्म उद्योग से जुड़े कई लोगों का मानना है कि संवेदनशील विषयों पर आधारित फिल्मों के मामलों में पारदर्शिता और संवाद बेहद जरूरी हैं। उनका कहना है कि यदि किसी सामग्री पर आपत्ति है तो उसके कारण स्पष्ट रूप से बताए जाने चाहिए, ताकि निर्माता, लेखक और अन्य संबंधित पक्ष आवश्यक कदम उठा सकें और अनिश्चितता की स्थिति से बचा जा सके।





