AI के भरोसे सुनाया फैसला पड़ा भारी! सुप्रीम कोर्ट ने NCLT-NCLAT के आदेश किए रद्द, कहा- फर्जी मिसालें बर्दाश्त नहीं

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नई दिल्ली: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और सख्त टिप्पणी करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के आदेशों को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने पाया कि इन फैसलों में एआई द्वारा तैयार की गई ऐसी न्यायिक मिसालों का हवाला दिया गया था, जो वास्तव में अस्तित्व में ही नहीं थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्यायिक फैसलों में फर्जी, काल्पनिक या मनगढ़ंत कानूनी उदाहरणों का इस्तेमाल किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने ऐसे मामलों में ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाने की बात कही है।

फर्जी कानूनी मिसालों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि एआई से तैयार की गई नकली न्यायिक मिसालों के आधार पर दिया गया कोई भी फैसला कानून की कसौटी पर वैध नहीं ठहराया जा सकता। अदालत के मुताबिक, ऐसी प्रवृत्ति न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता और कानून के शासन को कमजोर करती है।

पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में ऐसी सामग्री का सहारा लिया, जो वास्तविक रूप से मौजूद ही नहीं थी। यह पूरी तरह काल्पनिक और मनगढ़ंत जानकारी थी, जिसका उपयोग फैसले को समर्थन देने के लिए किया गया।

NCLT और NCLAT के आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने एनसीएलटी के 28 अगस्त 2024 और एनसीएलएटी के 11 सितंबर 2025 के आदेशों को निरस्त कर दिया। साथ ही दिवालियापन से जुड़े मामले को दोबारा सुनवाई के लिए एनसीएलटी के पास भेजते हुए दो सप्ताह के भीतर नया निर्णय देने का निर्देश दिया।

यह मामला एसेल इंफ्रा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड की निलंबित निदेशक पूजा रमेश सिंह की अपील से जुड़ा था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड द्वारा दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की धारा 7 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को चुनौती दी थी।

सुनवाई में सामने आई चौंकाने वाली जानकारी

अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि एनसीएलटी ने अपने फैसले में जिन कई न्यायिक निर्णयों का उल्लेख किया, उनमें से कुछ वास्तविक रूप से मौजूद ही नहीं थे। इतना ही नहीं, एआई से तैयार किए गए कुछ पैराग्राफ को भी सुप्रीम कोर्ट के असली फैसलों का हिस्सा बताकर उद्धृत किया गया था।

स्वतंत्र जांच के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी पाया कि कई संदर्भित मामले अस्तित्वहीन थे, जबकि कुछ उद्धृत अंश वास्तविक फैसलों में कहीं दर्ज नहीं थे।

AI मददगार है, लेकिन जज की जगह नहीं ले सकता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस न्यायिक कार्य में सहायक भूमिका निभा सकता है, लेकिन वह मानवीय विवेक और न्यायिक सोच का विकल्प नहीं बन सकता।

अदालत ने कहा कि फैसला सुनाने की अंतिम जिम्मेदारी न्यायाधीश की होती है और प्रक्रिया के प्रत्येक चरण में मानवीय निगरानी एवं निर्णय क्षमता का होना आवश्यक है।

बिना सत्यापन AI सामग्री पर भरोसा करना गंभीर चूक

शीर्ष अदालत ने चेतावनी देते हुए कहा कि अदालतों और वकीलों को एआई से तैयार सामग्री का उपयोग करने से पहले उसका पूर्ण सत्यापन करना चाहिए। बिना जांच के ऐसे उदाहरणों का इस्तेमाल पेशेवर जिम्मेदारियों के विपरीत है।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई न्यायाधीश अपने निर्णय में एआई से तैयार फर्जी कानूनी मिसालों का उपयोग करता है, तो यह एक गंभीर त्रुटि मानी जाएगी और ऐसे फैसले न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को प्रभावित करते हैं।

बार काउंसिल ऑफ इंडिया को भी दिया निर्देश

मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति अदालतों में वकीलों द्वारा एआई आधारित नकली या मनगढ़ंत कानूनी उदाहरण पेश किए जाने के मामलों की जांच करेगी और आवश्यक सुरक्षा उपायों की सिफारिश करेगी।

न्यायपालिका में AI के इस्तेमाल पर बड़ी नजीर

इस फैसले को न्यायिक क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि तकनीक का उपयोग सहायक उपकरण के रूप में किया जा सकता है, लेकिन न्यायिक निर्णयों की नींव केवल सत्यापित तथ्यों, प्रामाणिक कानून और मानवीय विवेक पर ही आधारित होनी चाहिए।

 

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