डीजल में बड़ा बदलाव करने की तैयारी! आइसोब्यूटेन मिश्रण अनिवार्य बनाने पर विचार, ऊर्जा सुरक्षा और प्रदूषण घटाने पर फोकस

isolet

नई दिल्ली: भारत सरकार परिवहन क्षेत्र में स्वच्छ ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देने और ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्र सरकार डीजल में आइसोब्यूटेन मिश्रण को अनिवार्य बनाने की संभावना पर विचार कर रही है। इस संबंध में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के सचिव वी. उमाशंकर ने महत्वपूर्ण जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस दिशा में अनुसंधान कार्य जारी है और शुरुआती नतीजे काफी उत्साहजनक रहे हैं।

उन्होंने कहा कि देश में पेट्रोल की तुलना में डीजल की खपत कहीं अधिक है। ऐसे में डीजल में वैकल्पिक ईंधनों का मिश्रण ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी अहम भूमिका निभा सकता है।

डीजल खपत कम करने और आयात निर्भरता घटाने की कोशिश

सरकार का मानना है कि आइसोब्यूटेन मिश्रण से न केवल ईंधन दक्षता में सुधार हो सकता है, बल्कि पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर होने वाले खर्च को कम करने में भी मदद मिलेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, वैकल्पिक ईंधनों को बढ़ावा देने की नीति देश की दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती जा रही है।

इथेनॉल आधारित वाहनों को मिलेगा नया प्रोत्साहन

वैकल्पिक ईंधनों के विस्तार के तहत मंत्रालय ने ई-85 और ई-100 श्रेणी के वाहनों के निर्माण को लेकर मसौदा अधिसूचना भी जारी की है। ई-85 ईंधन में 85 प्रतिशत इथेनॉल का मिश्रण होता है, जबकि ई-100 वाहन लगभग पूरी तरह इथेनॉल आधारित ईंधन पर चलते हैं।

इन वाहनों के लिए पेट्रोल पंपों पर अलग ईंधन डिस्पेंसर स्थापित करने की योजना बनाई गई है। भारत पहले ही पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल कर चुका है और अब सरकार इस दिशा में और आगे बढ़ना चाहती है।

इलेक्ट्रिक ट्रकों के लिए तैयार हो रही नई व्यवस्था

भारी वाणिज्यिक इलेक्ट्रिक वाहनों की चुनौतियों को देखते हुए सड़क परिवहन मंत्रालय ट्रैक्टर-ट्रेलर स्वैपिंग मॉडल पर भी काम कर रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत लंबी दूरी तय करने वाले ट्रकों में ट्रेलर बदलने की सुविधा विकसित की जाएगी।

सरकार का मानना है कि इससे बैटरी चार्जिंग में लगने वाला समय कम होगा और परिचालन लागत में भी कमी आएगी। विशेषज्ञों के मुताबिक इलेक्ट्रिक मालवाहक वाहनों के व्यापक उपयोग के लिए मजबूत चार्जिंग और बैटरी स्वैपिंग नेटवर्क विकसित करना जरूरी है।

हाइड्रोजन ईंधन परियोजनाओं को भी मिल रहा बढ़ावा

सरकार हाइड्रोजन आधारित परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देने पर भी तेजी से काम कर रही है। मंत्रालय के अनुसार विभिन्न हाइड्रोजन लॉजिस्टिक्स परियोजनाओं के शुरुआती परिणाम सकारात्मक रहे हैं और उनकी परिचालन लागत पारंपरिक परिवहन साधनों के करीब पहुंच रही है।

हाल ही में दिल्ली, फरीदाबाद और नोएडा के बीच हाइड्रोजन ईंधन से संचालित बसों का संचालन शुरू किया गया है। ये बसें एक बार ईंधन भरने के बाद लगभग 450 किलोमीटर तक का सफर तय करने में सक्षम हैं। भविष्य में प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों और आर्थिक गलियारों पर हाइड्रोजन रिफ्यूलिंग स्टेशनों का नेटवर्क विकसित करने की योजना है।

2027 तक बदल सकती है टोल वसूली की व्यवस्था

सड़क परिवहन मंत्रालय देशभर में मल्टी-लेन फ्री फ्लो टोल प्रणाली लागू करने की दिशा में भी काम कर रहा है। इस तकनीक के तहत वाहनों को टोल प्लाजा पर रुकने की आवश्यकता नहीं होगी और वे बिना बाधा अपनी यात्रा जारी रख सकेंगे।

मंत्रालय का लक्ष्य वर्ष 2027 तक चार या उससे अधिक लेन वाले प्रमुख टोल प्लाजा पर इस प्रणाली को लागू करना है। इसके अलावा दिल्ली-एनसीआर में उन्नत यातायात प्रबंधन प्रणाली विकसित करने की भी योजना है, जिससे एक्सप्रेसवे पर यातायात संचालन अधिक सुरक्षित और सुगम बनाया जा सके।