Monsoon Alert: 22 दिन में 43% कम बारिश से बढ़ी टेंशन, खेती पर संकट; महंगाई और ग्रोथ पर भी मंडराया खतरा
नई दिल्ली: देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की धीमी रफ्तार ने कृषि, खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। मानसून सीजन के शुरुआती 22 दिनों में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। मौसम विभाग के आंकड़े संकेत दे रहे हैं कि यदि जल्द ही वर्षा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो खरीफ फसलों की बुवाई, कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर गंभीर असर पड़ सकता है।
कई बड़े कृषि राज्यों में बारिश का भारी घाटा
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक 1 जून से 22 जून के बीच देश के प्रमुख कृषि राज्यों में सामान्य से काफी कम वर्षा हुई है। महाराष्ट्र में 82 प्रतिशत और गुजरात में 75 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं छत्तीसगढ़ में 69 प्रतिशत, झारखंड में 66 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 52 प्रतिशत और ओडिशा में 48 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई है।
उत्तर भारत और दक्षिण भारत के कई राज्य भी कमजोर मानसून की चपेट में हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश और तेलंगाना में सामान्य से 43 प्रतिशत कम बारिश हुई है, जबकि कर्नाटक में 40 प्रतिशत और केरल में 28 प्रतिशत वर्षा की कमी दर्ज की गई है।
2 जुलाई तक राहत के आसार कम
मौसम विभाग का अनुमान है कि 2 जुलाई तक मानसून की गतिविधियां अपेक्षाकृत कमजोर रह सकती हैं। ऐसे में खरीफ फसलों की बुवाई और शुरुआती विकास चरण प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि जून और जुलाई का शुरुआती दौर खरीफ सीजन के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है और इसी अवधि में पर्याप्त बारिश नहीं होने पर उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
कृषि मंत्री ने जताई चिंता
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कम बारिश को लेकर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि देश के लगभग 315 जिलों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई और पैदावार दोनों प्रभावित हो सकती हैं।
बुवाई की रफ्तार पर भी नजर
22 जून तक देश में करीब 1.17 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई है। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की समान अवधि के 1.13 करोड़ हेक्टेयर से थोड़ा अधिक है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले दिनों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो बुवाई की गति धीमी पड़ सकती है और पहले से बोई गई फसलों पर भी असर पड़ सकता है।
111 जिले घोषित किए गए अति-संवेदनशील
सरकार ने 111 जिलों को “अति-संवेदनशील” श्रेणी में रखा है। इन क्षेत्रों में सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं और खेती मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर है। इनमें अकेले महाराष्ट्र के 20 जिले शामिल हैं। ऐसे इलाकों में कमजोर मानसून का प्रभाव सबसे ज्यादा देखने को मिल सकता है।
महंगाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी असर की आशंका
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि खाद्यान्न उत्पादन में कमी आती है तो खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। इससे महंगाई दर में वृद्धि की संभावना है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की आय और उपभोक्ता मांग पर भी असर पड़ सकता है, जिसका प्रभाव व्यापक अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।
आर्थिक विकास दर पर भी नजर
भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए आर्थिक वृद्धि दर 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है, जो पिछले वित्त वर्ष के 7.7 प्रतिशत से कम है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि मानसून लंबे समय तक कमजोर बना रहता है तो विकास दर पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
अगले कुछ सप्ताह होंगे निर्णायक
कृषि और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए आने वाले सप्ताह बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। किसानों, मौसम विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की निगाहें अब मानसून की अगली प्रगति पर टिकी हैं, क्योंकि यही तय करेगा कि देश को राहत मिलेगी या सूखे और महंगाई की आशंकाएं और गहरा जाएंगी।





