फादर्स डे से पहले बेटियों ने दिया जिंदगी का सबसे बड़ा तोहफा! एक ने किडनी, दूसरी ने लीवर देकर बचाई पिता की जान
गाजियाबाद: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से एक ऐसी भावुक और प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी का दिल छू लिया है। फादर्स डे से ठीक पहले दो बेटियों ने अपने पिता को जीवनदान देकर रिश्तों की मिसाल कायम कर दी। एक बेटी ने अपनी किडनी दान की, जबकि दूसरी ने अपने लीवर का हिस्सा देकर पिता की जान बचाने में अहम भूमिका निभाई।
लीवर और किडनी दोनों हो चुके थे खराब
गाजियाबाद के मोरटा गांव निवासी 45 वर्षीय जयंत त्यागी, जो पूर्व में भाजपा के सेक्टर संयोजक भी रह चुके हैं, अचानक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। चिकित्सकीय जांच में पता चला कि उनकी किडनी और लीवर दोनों गंभीर रूप से प्रभावित हो चुके हैं और उन्हें तत्काल प्रत्यारोपण की आवश्यकता है। यह जानकारी मिलते ही परिवार के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई।
शादी से पहले बेटी ने लिया बड़ा फैसला
परिवार की मुश्किल घड़ी में सबसे पहले बड़ी बेटी रिषिका त्यागी आगे आईं। बीटेक की पढ़ाई पूरी कर चुकी रिषिका ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी एक किडनी पिता को दान करने का निर्णय लिया। खास बात यह है कि उनकी शादी भी कुछ महीनों बाद होने वाली है। जब उन्होंने अपने होने वाले ससुराल पक्ष को इस निर्णय की जानकारी दी, तो वहां से भी उन्हें पूरा समर्थन मिला।
छोटी बेटी ने भी निभाया फर्ज
बड़ी बहन के फैसले के बाद छोटी बेटी खुशी त्यागी ने भी अपने पिता के लिए बड़ा त्याग किया। बीटेक प्रथम वर्ष की छात्रा खुशी ने अपने लीवर का हिस्सा दान करने का फैसला लिया। दोनों बहनों का एक ही उद्देश्य था कि किसी भी कीमत पर अपने पिता को नया जीवन दिया जाए।
जटिल ऑपरेशन के बाद सफल हुआ प्रत्यारोपण
डॉक्टरों ने परिवार के कई सदस्यों की जांच की, लेकिन दोनों बेटियों की रिपोर्ट प्रत्यारोपण के लिए सबसे उपयुक्त पाई गई। आवश्यक चिकित्सकीय प्रक्रियाओं और काउंसलिंग के बाद नोएडा के एक निजी अस्पताल में जटिल सर्जरी की गई। लंबी प्रक्रिया के बाद डॉक्टरों ने सफलतापूर्वक किडनी और लीवर प्रत्यारोपण पूरा किया।
पिता और दोनों बेटियों की हालत स्थिर
परिवार के अनुसार ऑपरेशन के बाद जयंत त्यागी और उनकी दोनों बेटियों की स्थिति सामान्य और स्थिर बनी हुई है। चिकित्सकों की निगरानी में तीनों का इलाज जारी है।
पूरा गांव और समाज कर रहा बेटियों को सलाम
जयंत त्यागी के छोटे भाई अमित रंजन ने बताया कि शुरुआत में परिवार बेटियों के स्वास्थ्य और भविष्य को लेकर चिंतित था, लेकिन दोनों बेटियों का अटूट विश्वास था कि पिता का जीवन सबसे पहले है। इस दौरान बड़ी संख्या में सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता भी अस्पताल पहुंचे और रक्तदान कर सहयोग किया।
दोनों बेटियों के इस त्याग, साहस और समर्पण की कहानी अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि बेटियां केवल परिवार की शान ही नहीं, बल्कि संकट की घड़ी में सबसे बड़ी ताकत भी होती हैं।



