लाहौर में जन्मा आजाद भारत का पहला विलेन, भगत सिंह के साथ लड़ी आजादी की लड़ाई; फिल्मों में भी बनाई अलग पहचान

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नई दिल्ली: भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई कलाकारों ने खलनायक के किरदारों को यादगार बनाया, लेकिन हीरालाल ठाकुर की कहानी कुछ अलग रही। फिल्मों में विलेन की भूमिका से पहचान बनाने वाले हीरालाल ने अभिनय की दुनिया में कदम रखने से पहले स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लिया था। उन्हें आजाद भारत के शुरुआती दौर के चर्चित खलनायकों में गिना जाता है।

हीरालाल का जन्म 1912 में लाहौर में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का हिस्सा है। बचपन से ही उन्हें अभिनय में रुचि थी। फिल्मी दुनिया में आने से पहले वह स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े। बताया जाता है कि महज 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली थी। बाद में उनका संबंध भगत सिंह और लाला लाजपत राय जैसे स्वतंत्रता सेनानियों से भी रहा।

1928 में शुरू हुआ फिल्मी सफर

अभिनय के प्रति जुनून के चलते हीरालाल ने 1928 में फिल्मों में कदम रखा। उनकी पहली फिल्म शंकरदेव आर्या की डॉटर्स ऑफ टुडे बताई जाती है। इस फिल्म का संबंध पाकिस्तानी सिनेमा के शुरुआती दौर से भी जोड़ा जाता है।

इसके बाद 1930 में आई सफदर जंग में उन्होंने अभिनय किया। फिल्म की सफलता के बाद हीरालाल को अभिनेता के तौर पर पहचान मिलने लगी। धीरे-धीरे वह नकारात्मक भूमिकाओं के लिए पहचाने जाने लगे और हिंदी सिनेमा में उनका नाम खलनायक के तौर पर स्थापित हो गया।

फिल्म निर्माता मानने लगे थे ‘लकी चार्म’

1947 में देश के आजाद होने से पहले तक हीरालाल करीब 19 से 20 फिल्मों में काम कर चुके थे। इनमें ज्यादातर भूमिकाएं उन्होंने खलनायक के रूप में निभाईं। उस दौर में उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जाता है कि कई फिल्म निर्माता उन्हें अपनी फिल्मों के लिए ‘लकी चार्म’ मानते थे।

माना जाता था कि जिस फिल्म में हीरालाल विलेन की भूमिका निभाते हैं, उसके सफल होने की संभावना बढ़ जाती है। नकारात्मक किरदारों में उनके अभिनय ने उन्हें उस दौर के चर्चित कलाकारों की कतार में ला खड़ा किया था।

विभाजन के बाद लाहौर छोड़कर पहुंचे बॉम्बे

1947 में देश के विभाजन के बाद हीरालाल को लाहौर छोड़ना पड़ा। बताया जाता है कि वह कोलकाता के रास्ते बॉम्बे पहुंचे और अपनी पत्नी दर्पण रानी के साथ वहीं बस गए। इसके बाद उन्होंने भारतीय सिनेमा में अपने अभिनय करियर की दूसरी पारी शुरू की।

आजाद भारत में बतौर विलेन उनकी पहली प्रमुख फिल्म 1951 की बादल मानी जाती है। इसमें उन्होंने खलनायक की भूमिका निभाई थी। इसके बाद कई हिंदी फिल्मों में अलग-अलग तरह के नकारात्मक किरदार निभाकर उन्होंने अपनी पहचान और मजबूत की।

150 से ज्यादा फिल्मों में किया काम

हीरालाल का फिल्मी करियर करीब पांच दशक तक चला। इस दौरान उन्होंने 150 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। उनकी ज्यादातर फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा प्रदर्शन किया। वह मूक फिल्मों से लेकर टॉकीज और फिर हिंदी सिनेमा में आए बदलावों के दौर तक सक्रिय रहे।

हीरालाल और उनकी पत्नी दर्पण रानी के छह बच्चे थे, जिनमें पांच बेटे और एक बेटी शामिल थे। लंबे फिल्मी करियर के बाद उनकी आखिरी फिल्म 1981 में रिलीज हुई अमिताभ बच्चन की कालिया बताई जाती है।

शोहरत के बावजूद आखिरी दौर में झेली आर्थिक तंगी

हीरालाल ने पांच दशकों तक सिनेमा में काम किया और कई यादगार खलनायक किरदार निभाए, लेकिन जीवन का अंतिम दौर उनके लिए मुश्किलों से भरा रहा। बताया जाता है कि आखिरी समय में उनके पास पैसे तक नहीं बचे थे और उन्हें आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा।

हीरालाल ठाकुर की कहानी उस दौर के भारतीय सिनेमा की तस्वीर पेश करती है, जब एक कलाकार ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर फिल्मी पर्दे तक अपनी अलग पहचान बनाई। लाहौर में जन्मे इस अभिनेता ने आजाद भारत के शुरुआती दौर में खलनायक की भूमिका को लोकप्रिय बनाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

 

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