1971 की जीत के शिल्पकार के साथ हुआ बड़ा अन्याय! वर्षों तक नहीं मिला पूरा हक, फिर राष्ट्रपति कलाम ने दिलाया सम्मान

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नई दिल्ली: भारतीय सैन्य इतिहास में फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ का नाम अद्वितीय नेतृत्व, साहस और रणनीतिक कौशल के लिए स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उनकी अगुवाई में भारतीय सेना ने ऐसी ऐतिहासिक जीत हासिल की, जिसने न सिर्फ युद्ध का परिणाम बदल दिया बल्कि दक्षिण एशिया के नक्शे पर बांग्लादेश नाम के नए राष्ट्र का उदय भी हुआ। हालांकि देश को यह गौरव दिलाने वाले महान सैन्य अधिकारी को जीवन के अंतिम वर्षों में अपने अधिकारों के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा।

डॉक्टर नहीं, सेना का सिपाही बनने का चुना रास्ता

3 अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में जन्मे सैम होर्मूसजी फ्रैमजी जमशेदजी मानेकशॉ के पिता चाहते थे कि उनका बेटा डॉक्टर बने, लेकिन सैम ने सैन्य जीवन को चुना। वर्ष 1932 में वह भारतीय सैन्य अकादमी के पहले बैच का हिस्सा बने और यहीं से उनके गौरवशाली सैन्य करियर की शुरुआत हुई।

अपने साहस, नेतृत्व क्षमता और सैनिकों के प्रति समर्पण के कारण वह लगातार ऊंचाइयों पर पहुंचते गए। गोरखा जवानों ने उन्हें सम्मानपूर्वक ‘सैम बहादुर’ नाम दिया, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

जब इंदिरा गांधी को भी करना पड़ा इंतजार

1971 के युद्ध से पहले पूर्वी पाकिस्तान में हालात तेजी से बिगड़ रहे थे। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तत्काल सैन्य कार्रवाई की संभावना पर विचार किया था। लेकिन सैम मानेकशॉ ने स्पष्ट रूप से कहा कि युद्ध जीतने के लिए सेना को पूरी तैयारी का समय चाहिए।

उन्होंने मौसम, सैन्य संसाधनों और रणनीतिक तैयारियों का हवाला देते हुए कुछ महीनों का समय मांगा। उनका यह निर्णय बाद में पूरी तरह सही साबित हुआ। 3 दिसंबर 1971 को युद्ध शुरू हुआ और महज 13 दिनों में भारतीय सेना ने ढाका को चारों तरफ से घेर लिया। अंततः पाकिस्तान के करीब 90 हजार सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया और बांग्लादेश का गठन हुआ।

सेवानिवृत्ति के बाद नहीं मिला पूरा अधिकार

15 जनवरी 1973 को सेवानिवृत्त होने के बावजूद फील्ड मार्शल का पद आजीवन माना जाता है। इस पद पर आसीन अधिकारी को पूर्ण वेतन, भत्ते और अन्य सुविधाओं का अधिकार प्राप्त होता है।

लेकिन प्रशासनिक और नौकरशाही कारणों के चलते सैम मानेकशॉ को वर्षों तक केवल आधी पेंशन ही मिलती रही। उनके कई वित्तीय अधिकार लंबित रहे और लंबे समय तक उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया, जिसके वे वास्तविक हकदार थे।

जब राष्ट्रपति कलाम ने दिलाया न्याय

स्थिति तब बदली जब तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने इस मामले पर ध्यान दिया। उनके हस्तक्षेप के बाद सरकार ने लंबित मामलों का समाधान किया।

अप्रैल 2007 में तत्कालीन रक्षा सचिव शेखर दत्त वेलिंगटन स्थित अस्पताल पहुंचे और सैम मानेकशॉ को 1.16 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान सौंपा। यह केवल आर्थिक देनदारी का निपटारा नहीं था, बल्कि देश की ओर से अपने महान सैनिक के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक भी माना गया।

94 वर्ष की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

27 जून 2008 को तमिलनाडु के वेलिंगटन स्थित सैन्य अस्पताल में फेफड़ों के संक्रमण के कारण 94 वर्ष की आयु में सैम मानेकशॉ का निधन हो गया। उनके निधन के साथ भारतीय सेना ने अपने सबसे प्रतिष्ठित और सम्मानित सैन्य नेताओं में से एक को खो दिया।

आज भी प्रेरणा हैं सैम बहादुर

सैम मानेकशॉ ने अपने जीवन से यह साबित किया कि नेतृत्व केवल युद्ध जीतने की क्षमता नहीं, बल्कि सही समय पर सही निर्णय लेने का साहस भी है। उनकी रणनीति, दूरदर्शिता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने की सोच आज भी भारतीय सेना के अधिकारियों और जवानों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

 

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