जज नियुक्ति विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश! कॉलेजियम की गोपनीय प्रक्रिया में दखल से इनकार, कहा- हर सिफारिश की नहीं हो सकती जांच

26-jun-3

नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट कर दिया है कि कॉलेजियम की सिफारिशों में सामान्य परिस्थितियों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति एक स्वतंत्र, संवेदनशील और गोपनीय प्रक्रिया है, जिसकी गहन न्यायिक समीक्षा केवल असाधारण परिस्थितियों में ही संभव हो सकती है।

मामला हिमाचल प्रदेश के वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी अरविंद मल्होत्रा की याचिका से जुड़ा था। उन्होंने उस सिफारिश को चुनौती दी थी, जिसमें उनसे जूनियर तीन न्यायिक अधिकारियों के नाम हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद के लिए आगे बढ़ाए गए थे। याचिकाकर्ता का दावा था कि पहले उनके नाम पर पुनर्विचार का निर्देश दिया गया था, लेकिन बाद में उनसे कनिष्ठ अधिकारियों की सिफारिश कर दी गई।

कॉलेजियम के फैसलों की पड़ताल का कोई आधार नहीं

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने की। अदालत ने कहा कि जब हाईकोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश को सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पहले ही स्वीकृति दे चुका है, तब उस प्रक्रिया की दोबारा न्यायिक समीक्षा का कोई ठोस आधार नहीं बनता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि कॉलेजियम की कार्यवाही स्वभावतः गोपनीय होती है और उसकी विस्तृत जांच शुरू करना पूरी नियुक्ति व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

‘हर सिफारिश की जांच हुई तो पैदा होंगे गंभीर परिणाम’

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में गोपनीयता बनाए रखना बेहद जरूरी है। यदि प्रत्येक सिफारिश और निर्णय की न्यायिक जांच शुरू कर दी जाए तो इससे नियुक्ति प्रणाली प्रभावित होगी और अनावश्यक विवादों को बढ़ावा मिलेगा।

अदालत ने टिप्पणी की कि वह इस स्तर पर कॉलेजियम के निर्णयों की जांच कर किसी नए विवाद या जटिल स्थिति को जन्म नहीं देना चाहती।

याचिकाकर्ता ने वापस लिया मामला

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि उनके मुवक्किल संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर अपनी याचिका को आगे नहीं बढ़ाना चाहते।

इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निस्तारण करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता चाहें तो अपनी शिकायत सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के समक्ष रख सकते हैं या कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपायों का सहारा ले सकते हैं।

केवल वरिष्ठता नियुक्ति का आधार नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि केवल वरिष्ठता किसी न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने का स्वतः अधिकार नहीं देती। अदालत ने कहा कि कॉलेजियम नियुक्तियों के दौरान कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करता है।

इनमें उम्मीदवार की योग्यता, अनुभव, कार्यशैली, ईमानदारी, पेशेवर क्षमता और समग्र मूल्यांकन जैसे कारक शामिल होते हैं। इसलिए केवल वरिष्ठ होने के आधार पर नियुक्ति का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

भविष्य में नाम पर फिर हो सकता है विचार

पीठ ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को अंतिम रूप से अस्वीकार कर दिया गया है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने संकेत दिया कि संबंधित अधिकारी की सेवा अवधि अभी पर्याप्त है और भविष्य में यदि रिक्तियां उत्पन्न होती हैं तो उनके नाम पर दोबारा विचार किया जा सकता है।

कॉलेजियम की गोपनीयता और स्वतंत्रता पर फिर लगी मुहर

इस फैसले के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि न्यायपालिका में नियुक्तियों की प्रक्रिया में पारदर्शिता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही आवश्यक उसकी गोपनीयता भी है। अदालत ने संकेत दिया कि कॉलेजियम प्रणाली में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रहेगा ताकि संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और गरिमा अक्षुण्ण बनी रहे।

 

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