HC का बड़ा फैसला, जग्गी हत्याकांड में पूर्व CM अजीत जोगी के बेटे अमित को आजीवन कारावास

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने साल 2003 के बहुचर्चित राम अवतार जग्गी हत्याकांड में पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी (Amit Jogi) दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा (Life Sentence) सुनाई है। हाईकोर्ट ने बीते गुरुवार को अमित जोगी को इस मामले में दोषी करार दिया था। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट द्वारा अमित जोगी को सजा सुनाया जाना 23 सालों से चल रही कानूनी लड़ाई में एक बड़ा मोड़ है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया। बेंच ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और 120बी (आपराधिक षड्यंत्र) के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है। जुर्माना नहीं देने पर छह माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास भुगतना होगा।

हाईकोर्ट का आज का फैसला 31 मई 2007 को रायपुर की स्पेशल सीबीआई कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय को पूरी तरह पलटता है, जिसमें अमित जोगी को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया था, जबकि चिमन सिंह, याह्या ढेबर, अभय गोयल और फिरोज सिद्दीकी समेत अन्य 28 आरोपियों को दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि एक ही गवाही के आधार पर कुछ आरोपियों को सजा देना और कथित मुख्य साजिशकर्ता को छोड़ देना न्यायसंगत नहीं है। हाईकोर्ट ने इसे विधिक दृष्टि से त्रुटिपूर्ण बताया।

गौरतलब है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोबारा खोला गया था, जिसके बाद हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के दौरान सतीश जग्गी की ओर से वकील बीपी शर्मा ने गंभीर तर्क प्रस्तुत किए। उन्होंने अदालत को बताया कि यह हत्याकांड उस समय की राज्य सरकार के संरक्षण में रचा गया षड्यंत्र था। दलील दी गई कि जब सीबीआई ने जांच शुरू की, तब प्रभावशाली हस्तक्षेप के चलते महत्वपूर्ण सबूतों को मिटा दिया गया। ऐसे मामलों में केवल भौतिक साक्ष्यों की कमी के आधार पर आरोपियों को राहत नहीं दी जा सकती, बल्कि पूरे षड्यंत्र की कड़ियों को समझना आवश्यक है।

उल्लेखनीय है कि 4 जून 2003 को राष्ट्रवादी कांग्रेस (राकांपा) नेता रामावतार जग्गी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस प्रकरण में कुल 31 लोगों को आरोपी बनाया गया था। बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह बाद में सरकारी गवाह बन गए थे। शेष 28 आरोपियों को सजा मिली थी, जबकि अमित जोगी को ट्रायल कोर्ट ने बरी कर दिया था। बाद में रामावतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। शुरुआती दौर में अमित जोगी को राहत मिली, लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पुनर्विचार के लिए हाईकोर्ट भेज दिया था।

कारोबारी और राजनेता रामावतार जग्गी, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के करीबी माने जाते थे। कांग्रेस से अलग होकर जब शुक्ल ने राकांपा का रुख किया, तब जग्गी भी उनके साथ जुड़े और उन्हें छत्तीसगढ़ में पार्टी का कोषाध्यक्ष बनाया गया। जग्गी हत्याकांड में अभय गोयल, याहया ढेबर, वीके पांडे, फिरोज सिद्दीकी, राकेश चंद्र त्रिवेदी, अवनीश सिंह लल्लन, सूर्यकांत तिवारी, अमरीक सिंह गिल, चिमन सिंह, सुनील गुप्ता, राजू भदौरिया, अनिल पचौरी, रविंद्र सिंह, रवि सिंह, लल्ला भदौरिया, धर्मेंद्र, सत्येंद्र सिंह, शिवेंद्र सिंह परिहार, विनोद सिंह राठौर, संजय सिंह कुशवाहा, राकेश कुमार शर्मा, (मृत) विक्रम शर्मा, जबवंत और विश्वनाथ राजभर को दोषी पाया गया था।