फ्रांस का ‘मिशन पेगासे’ भारत पहुंचा, 48 घंटे में दुनिया के किसी भी हिस्से में पहुंचने की क्षमता; जानें क्यों है खास
नई दिल्ली: फ्रांस की एयर और स्पेस फोर्स का ‘मिशन पेगासे’ करीब 40 हजार किलोमीटर की यात्रा पर है और फिलहाल भारत पहुंच चुका है। वर्ष 2018 में शुरू किए गए इस मिशन का यह सातवां संस्करण है। इस बार मिशन में 300 एयरक्रू के साथ चार राफेल लड़ाकू विमान, तीन A330 MRTT फीनिक्स और दो A400M एटलस विमान शामिल हैं। मिशन की शुरुआत आर्कटिक क्षेत्र से हुई है और फ्रांस के ये विमान यात्रा के दौरान नौ स्थानों पर रुकेंगे।
मिशन पेगासे-26 के तहत फ्रांस की टीम प्रशांत महासागर, पूर्वी एशिया और हिंद महासागर से होते हुए मध्य पूर्व और आसपास के क्षेत्रों तक जाएगी। मिशन के प्रमुख मेजर जनरल जूलियन साबेने ने इस अभियान की चुनौतियों और क्षमताओं के बारे में जानकारी दी है।
कई देशों और बदलते मौसम के बीच चुनौतीपूर्ण मिशन
मेजर जनरल जूलियन के मुताबिक मिशन की सबसे बड़ी चुनौती इसकी व्यस्त और लगातार बदलती परिस्थितियां हैं। टीम अलास्का के आर्कटिक क्षेत्र के बेहद ठंडे मौसम से निकलकर जापान पहुंची, जहां तापमान करीब 25 डिग्री सेल्सियस था। मौसम में बदलाव के साथ अलग-अलग समय क्षेत्रों में जाना भी टीम के लिए चुनौतीपूर्ण रहता है।
MRTT विमान से चलता है कमांड और कंट्रोल
पेगासे मिशन के दौरान करीब 10 घंटे की उड़ान के बाद आराम करना आसान नहीं होता। पूरा मिशन कमांड और कंट्रोल व्यवस्था के तहत संचालित किया जाता है। इसका नियंत्रण एक MRTT विमान से किया जाता है, जहां मिशन प्रमुख भी तैनात रहते हैं। इसके साथ फ्रांस स्थित ऑपरेशन सेंटर से भी लगातार संपर्क बना रहता है।
किसी नए स्थान पर पहुंचने के बाद भी टीम तुरंत आराम नहीं कर पाती। सहयोगी देशों की ओर से स्वागत और अलग-अलग समय क्षेत्रों के कारण होने वाला जेट लैग भी चुनौती बढ़ाता है। सामान्य जैविक दिनचर्या में लौटने में करीब एक सप्ताह लग सकता है। इसी बीच अगले पड़ाव के लिए रवाना होने का समय आ जाता है।
48 घंटे में दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुंचने की क्षमता
मिशन प्रमुख ने बताया कि इस साल पेगासे में चार लड़ाकू विमान तैनात किए गए हैं। वर्ष 2018 में तीन लड़ाकू विमान और 2023 में 10 लड़ाकू विमान तैनात किए गए थे। लड़ाकू विमानों की संख्या के हिसाब से हर मिशन की जरूरत और व्यवस्था अलग होती है।
10 लड़ाकू विमानों की तैनाती के लिए एक ही हवाई अड्डा पर्याप्त नहीं होता, क्योंकि वहां इतने विमानों को खड़ा करने के लिए पर्याप्त जगह या पार्किंग क्षेत्र उपलब्ध नहीं होता। ऐसे में विमानों को अलग-अलग स्थानों पर रखना पड़ता है।
राफेल, MRTT और A330 का संयोजन बना ताकत
फ्रांस अब बड़े स्तर की तैनाती कम समय में करने में सक्षम है। मिशन प्रमुख के मुताबिक इसमें नए उपकरणों की महत्वपूर्ण भूमिका है। पहले फ्रांस के पास मिराज, C-135 और ट्रांसऑल जैसे विमान थे, जबकि अब MRTT, राफेल और A330 का संयोजन लंबी दूरी के अभियानों में मदद करता है।
इस व्यवस्था के जरिए फ्रांस की टीम दुनिया के लगभग किसी भी हिस्से में 48 घंटे के भीतर पहुंच सकती है। वहां पहुंचने के बाद विमानों में तेजी से ईंधन भरने, हथियार लगाने और उन्हें ऑपरेशन के लिए तैयार करने की क्षमता भी मौजूद है।
एक साथ लेकर चलते हैं जरूरी संसाधन
पेगासे मिशन के लिए फ्रांस ने ऐसी व्यवस्था विकसित की है, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में तैनाती के दौरान टीम काफी हद तक आत्मनिर्भर रह सके। फ्रांस से रवाना होते समय विमानों के साथ इंजीनियर, एयर सपोर्ट टीम, आईटी सपोर्ट टीम और अन्य जरूरी कर्मचारी मौजूद रहते हैं।
इसके अलावा स्पेयर पार्ट्स, औजार और ऑपरेशन के लिए आवश्यक अन्य सामान भी साथ ले जाया जाता है। अलग-अलग जगहों पर रुकते हुए आगे बढ़ने के दौरान सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि टीम स्थानीय परिस्थितियों में भी अपने ऑपरेशन को आत्मनिर्भर तरीके से जारी रख सके।
2018 से अब तक काफी अनुभव हासिल किया
2018 में जब पेगासे मिशन की शुरुआत हुई थी, तब टीम के सामने यह तय करना बड़ी चुनौती थी कि लंबी यात्रा के दौरान कौन-कौन से संसाधन साथ ले जाने जरूरी होंगे। सभी चीजें साथ ले जाना संभव नहीं था, क्योंकि लड़ाकू विमान और उनके चालक दल को भी तैनाती का हिस्सा बनाना होता है।
अब कई वर्षों के अनुभव के बाद टीम पहले से अनुमान लगा सकती है कि अलग-अलग वातावरण में किस तरह की तकनीकी समस्या सामने आ सकती है। इसी आधार पर जरूरी स्पेयर पार्ट्स और उपकरणों का पैकेज तैयार किया जाता है, जिससे तैनाती के दौरान काम तेजी से किया जा सके।
हर पड़ाव पर सीखने और अनुभव का मौका
मिशन के अलग-अलग पड़ाव फ्रांस की टीम के लिए सैन्य और सांस्कृतिक अनुभव का अवसर भी बनते हैं। अलग-अलग देशों के साथ बातचीत के दौरान उनकी संस्कृति को समझने के साथ एयर ऑपरेशंस और स्पेस ऑपरेशंस के अलग-अलग तरीकों को जानने का मौका मिलता है।
मिशन प्रमुख के मुताबिक यह अनुभव और बेहतर तरीकों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया भी है। फ्रांस जहां जाता है, वहां से कुछ नया सीखने की कोशिश करता है और अपने अनुभव तथा जानकारी को सहयोगी देशों के साथ साझा करता है।
अलग-अलग संस्कृतियों के बीच 360 डिग्री अनुभव
अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया और भारत जैसे देशों की संस्कृति और परिस्थितियां एक-दूसरे से काफी अलग हैं। मिशन के दौरान टीम को हर जगह के माहौल के अनुसार खुद को ढालना पड़ता है। एक जगह की परिस्थितियों के अभ्यस्त होने तक अगले पड़ाव के लिए रवाना होने का समय आ जाता है।
मिशन प्रमुख के अनुसार पेगासे की सबसे बड़ी खासियत यही है कि करीब 40 हजार किलोमीटर की यह यात्रा टीम को अलग-अलग देशों, संस्कृतियों और ऑपरेशनल परिस्थितियों का व्यापक अनुभव देती है।





