जब भारत को गिरवी रखना पड़ा था अपना सोना: 1991 के संकट से लेकर आज तक गोल्ड क्यों बना चिंता की वजह

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नई दिल्ली। भारत में सोना (Gold) सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि भावनाओं और निवेश का सबसे भरोसेमंद जरिया माना जाता है। लेकिन यही ‘पीली धातु’ (Yellow Metal) कई बार देश की अर्थव्यवस्था (Economy) के लिए बड़ी चुनौती भी बन चुकी है। आज भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना खरीदार देश है और लगातार बढ़ता गोल्ड इंपोर्ट सरकार की चिंता बढ़ा रहा है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री Narendra Modi की ओर से भी लोगों से गैर-जरूरी सोना खरीदने से बचने की अपील की गई है।

वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का सोना आयात 24 प्रतिशत से ज्यादा बढ़कर 71.98 अरब डॉलर यानी छह लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया। इससे पहले 2024-25 में यह आंकड़ा करीब 58 अरब डॉलर था। मात्रा के लिहाज से आयात घटकर 721.03 टन रह गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के कारण भुगतान ज्यादा करना पड़ा। कच्चे तेल के बाद सोना अब भारत का दूसरा सबसे बड़ा आयातित उत्पाद बन चुका है। कुल आयात बिल में इसकी हिस्सेदारी करीब 9 प्रतिशत है। हालांकि रिकॉर्ड कीमतों के चलते अप्रैल 2026 में गोल्ड इंपोर्ट घटकर केवल 15 टन रह गया, जिसे 30 वर्षों का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है।

भारत के आर्थिक इतिहास का सबसे बड़ा संकट 1990-91 में सामने आया था। उस समय देश के विदेशी मुद्रा भंडार की हालत इतनी खराब हो गई थी कि केवल कुछ हफ्तों का आयात बिल चुकाने लायक डॉलर बचे थे। देश को आर्थिक दिवालियापन से बचाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री Chandra Shekhar की सरकार ने बड़ा फैसला लिया।

रिजर्व बैंक के जरिए भारत का 47 से 67 टन सोना स्विट्जरलैंड और इंग्लैंड के बैंकों में गिरवी रखकर विदेशी कर्ज लिया गया। यह पूरी प्रक्रिया बेहद गोपनीय रखी गई थी, लेकिन जानकारी सामने आने के बाद सरकार की जमकर आलोचना हुई। हालांकि उसी संकट के बाद भारत में आर्थिक सुधारों का दौर शुरू हुआ।

1960 के दशक के आखिर में भारत विदेशी मुद्रा और खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री Indira Gandhi की सरकार ने 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया। इसके तहत सोने की छड़ें और सिक्के रखने पर रोक लगा दी गई थी। लोगों को केवल आभूषण के रूप में सोना रखने की अनुमति थी। सुनारों के लिए भी कड़े नियम बनाए गए थे।

साल 2013 में रुपया तेजी से कमजोर हो रहा था और डॉलर की मांग बढ़ रही थी। उस समय तत्कालीन वित्त मंत्री P. Chidambaram ने लोगों से छह महीने से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की थी। उस दौरान चालू खाता घाटा लगातार बढ़ रहा था और सरकार पर आर्थिक दबाव बढ़ गया था।

असल चिंता सोना नहीं, बल्कि उस पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना आयात करता है और इसके लिए भारी मात्रा में डॉलर खर्च होते हैं। जब गोल्ड इंपोर्ट बढ़ता है तो व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा बढ़ने लगता है। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सोने की मांग लगातार बढ़ती रही तो इसका असर देश की आर्थिक स्थिरता और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ सकता है।

कई देशों ने भी लगाए हैं प्रतिबंध

China में सोने के आयात पर केंद्रीय बैंक का सख्त नियंत्रण है और इसके लिए विशेष लाइसेंस जरूरी होता है।

Turkey ने व्यापार घाटा कम करने के लिए गोल्ड इंपोर्ट पर कोटा लागू किया हुआ है।

United States में 1971 में राष्ट्रपति Richard Nixon ने डॉलर को सोने में बदलने की व्यवस्था समाप्त कर दी थी और आयात पर अतिरिक्त शुल्क लगाया था।

भारत में सोने की मांग सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से बेहद मजबूत मानी जाती है, लेकिन बढ़ती कीमतों और विदेशी मुद्रा पर दबाव ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है।