1947 में 27 पैसे था पेट्रोल, आज ₹100 के पार; 78 साल में ऐसे बदले तेल के दाम और देश की तस्वीर

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नई दिल्ली: देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। तेल कंपनियों ने 10 दिनों में चौथी बार ईंधन के दाम बढ़ाए हैं। ताजा बढ़ोतरी के बाद दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। लेकिन क्या आपको पता है कि आजादी के समय भारत में पेट्रोल की कीमत कितनी थी? उस दौर में आज के 100 रुपये में सैकड़ों लीटर तेल खरीदा जा सकता था।

1947 में जब देश आजाद हुआ था, तब पेट्रोल की कीमत करीब 25 से 27 पैसे प्रति लीटर और डीजल की कीमत 15 से 20 पैसे प्रति लीटर थी। यानी आज दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत जितने पैसे में उस दौर में करीब 400 लीटर से ज्यादा पेट्रोल खरीदा जा सकता था।

78 साल में कैसे बढ़ते गए पेट्रोल के दाम

भारत में पेट्रोल की कीमतों का सफर देश की आर्थिक और वैश्विक परिस्थितियों के साथ लगातार बदलता रहा। शुरुआती दशकों में तेल बेहद सस्ता था, लेकिन समय के साथ युद्ध, अंतरराष्ट्रीय बाजार और टैक्स सिस्टम के कारण कीमतें लगातार बढ़ती गईं।

पेट्रोल की कीमतों का इतिहास

1947 – 27 पैसे प्रति लीटर
1970 – 90 पैसे प्रति लीटर
1990 – 4.20 रुपये प्रति लीटर
2004 – 33.71 रुपये प्रति लीटर
2008 – 51 रुपये प्रति लीटर
2014 – 72.43 रुपये प्रति लीटर
2026 – 102 रुपये प्रति लीटर के पार

भारत का पहला पेट्रोल पंप कब खुला था?

भारत में पहला पेट्रोल पंप साल 1928 में मुंबई में शुरू हुआ था। उस समय पेट्रोल की कीमत मात्र 6 पैसे प्रति लीटर थी। शुरुआती दौर में पेट्रोल पंपों पर हैंडपंप की मदद से तेल निकाला जाता था और गाड़ियों में भरा जाता था।

उस समय डिजिटल मशीनें नहीं होती थीं। पेट्रोल डिस्पेंसर पर बड़े गोल डायल लगे होते थे, जिनकी सुइयों से यह पता चलता था कि कितनी मात्रा में तेल भरा गया है।

तब लीटर नहीं, गैलन में बिकता था पेट्रोल

आजादी के समय भारत में पेट्रोल लीटर में नहीं बल्कि गैलन में बेचा जाता था। एक गैलन में करीब 4.5 लीटर तेल आता था।

बाद में भारत सरकार ने 1956 में “स्टैंडर्ड ऑफ वेट्स एंड मेजर्स एक्ट” लागू किया और देश में मीट्रिक सिस्टम अपनाया गया। इसके बाद 1 अक्टूबर 1960 से पेट्रोल पंपों पर गैलन की जगह लीटर में तेल बेचना शुरू हुआ।

विदेशी कंपनियों का था दबदबा

आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत के तेल बाजार पर विदेशी कंपनियों का नियंत्रण था। बर्मा शेल, स्टैनवैक और कैल्टेक्स जैसी कंपनियां भारतीय बाजार में प्रमुख थीं।

बाद में सरकार ने तेल कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया। बर्मा शेल से भारत पेट्रोलियम और ESSO से हिंदुस्तान पेट्रोलियम अस्तित्व में आईं। वहीं इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन देश की सबसे बड़ी सरकारी तेल कंपनी बनकर उभरी।

मिट्टी के तेल से शुरू हुआ था कारोबार

20वीं सदी की शुरुआत में भारत में गाड़ियों की संख्या बेहद कम थी। उस समय तेल कंपनियों का मुख्य कारोबार पेट्रोल नहीं बल्कि मिट्टी का तेल बेचना था, जिसका इस्तेमाल लालटेन जलाने में होता था।

बताया जाता है कि कंपनियां केरोसिन के साथ मुफ्त लालटेन भी देती थीं, जिससे उनकी बिक्री तेजी से बढ़ी।

युद्ध के दौरान लागू हुआ था पेट्रोल कूपन सिस्टम

द्वितीय विश्व युद्ध और आजादी के शुरुआती वर्षों में भारत में तेल की भारी कमी थी। उस दौर में सरकार ने पेट्रोल के लिए कूपन और कोटा सिस्टम लागू किया था।

कार मालिकों को सीमित मात्रा में पेट्रोल मिलता था। डॉक्टरों, अधिकारियों और जजों को ज्यादा कूपन दिए जाते थे। तेल चोरी होने के डर से लोग अपनी गाड़ियों को लंबे समय तक गैरेज में बंद रखते थे।

पहली बार ₹100 के पार पहुंचा पेट्रोल

वर्ष 2014 में पेट्रोल की कीमतें 72 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंची थीं। इसके बाद 2015 में कुछ गिरावट आई और दाम करीब 60 रुपये तक आ गए।

हालांकि बाद के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों और टैक्स बढ़ने के कारण पेट्रोल लगातार महंगा होता गया। वर्ष 2024 में पहली बार पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंचा और अब 2026 में कई शहरों में यह 102 रुपये से ज्यादा हो चुका है।