होर्मुज और स्वेज की टेंशन के बीच खुला नया रास्ता, बर्फीले समुद्री मार्ग से होगा कारोबार; 2027 में भारत भेजेगा जहाज
नई दिल्ली: होर्मुज और स्वेज नहर जैसे प्रमुख समुद्री मार्गों को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच वैश्विक व्यापार के लिए एक नए रास्ते पर जोर बढ़ रहा है। रूस के साइबेरियाई तट के ऊपर से आर्कटिक महासागर होकर गुजरने वाले इस मार्ग को चीन यूरोप तक व्यापार पहुंचाने के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की तैयारी में है। भारत भी इस रास्ते की संभावनाओं को देखते हुए 2027 में परीक्षण के लिए अपना जहाज भेजने की योजना बना रहा है।
आर्कटिक समुद्री मार्ग पर बढ़ा फोकस
लाल सागर, स्वेज नहर और अन्य समुद्री मार्गों पर तनाव तथा युद्ध की स्थिति ने वैश्विक व्यापार के लिए सुरक्षित और वैकल्पिक समुद्री रास्तों की जरूरत बढ़ा दी है। किसी प्रमुख मार्ग के बाधित होने पर जहाजों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे परिवहन का समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। इसी जोखिम को देखते हुए चीन आर्कटिक समुद्री मार्ग के जरिए यूरोप तक पहुंच बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
चीन से यूरोप करीब 20 दिन में पहुंचने का दावा
आर्कटिक मार्ग के जरिए चीन से यूरोप की यात्रा करीब 20 दिन में पूरी की जा सकती है। फिलहाल चीन से यूरोप जाने वाले बड़े कंटेनर जहाज हिंद महासागर, अरब सागर और लाल सागर से होते हुए स्वेज नहर पार कर भूमध्य सागर के रास्ते यूरोप पहुंचते हैं। इसके मुकाबले प्रस्तावित आर्कटिक मार्ग में जहाज चीन के उत्तरी हिस्से से निकलकर रूस के साइबेरियाई तट के ऊपर से आर्कटिक महासागर में प्रवेश करेंगे और फिर यूरोप की ओर आगे बढ़ेंगे।
चीन के लिए रणनीतिक महत्व का रास्ता
चीन लंबे समय से अपने व्यापार और ऊर्जा आयात के लिए कुछ प्रमुख समुद्री मार्गों पर निर्भरता को लेकर चिंतित रहा है। इसे उसकी ‘मलक्का दुविधा’ से भी जोड़ा जाता है। मलक्का जलमार्ग में संकट या नाकाबंदी की स्थिति चीन के लिए बड़ी चुनौती पैदा कर सकती है। ऐसे में चीन ‘आइस सिल्क रोड’ को केवल व्यापारिक विकल्प नहीं, बल्कि रणनीतिक परियोजना के तौर पर भी देख रहा है।
अमेरिका और यूरोप की ओर से रूस पर बढ़ते दबाव के बीच चीन और रूस के बीच सहयोग वाला यह मार्ग भविष्य में वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
भारत भी तलाश रहा हिस्सेदारी का रास्ता
भारत के लिए आर्कटिक समुद्री मार्ग का महत्व ऊर्जा सुरक्षा, रूस के साथ व्यापार और यूरोप से बेहतर संपर्क से जुड़ा है। इस मार्ग के जरिए रूस के आर्कटिक क्षेत्र और सुदूर पूर्व से तेल, गैस तथा अन्य संसाधनों की आपूर्ति को आसान बनाने की संभावनाएं हैं। भारत ने 2027 में इस मार्ग पर अपना पहला जहाज परीक्षण के तौर पर भेजने की योजना बनाई है।
लगभग 5,600 किलोमीटर लंबा है समुद्री मार्ग
रूस के आर्कटिक तट के साथ गुजरने वाला यह मार्ग करीब 5,600 किलोमीटर लंबा है। इसे पूर्वी एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला सबसे छोटा समुद्री शिपिंग मार्ग बताया जाता है। चीन से उत्तरी यूरोप तक इस रास्ते से यात्रा करीब 18 से 20 दिन में पूरी हो सकती है। वहीं, स्वेज नहर या अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते यात्रा में करीब 40 से 50 दिन तक लग सकते हैं। दूरी कम होने से ईंधन और परिचालन लागत में भी कमी आने की संभावना है।
समय बचाने में मिल सकता है बड़ा फायदा
इस मार्ग का सबसे बड़ा फायदा यात्रा के समय में कमी को माना जा रहा है। चीन से यूरोप की समुद्री यात्रा आर्कटिक मार्ग से करीब 20 दिन में हो सकती है, जबकि चीन-यूरोप रेल मार्ग से लगभग 25 दिन और स्वेज नहर के रास्ते करीब 40 दिन लगते हैं। केप ऑफ गुड होप के रास्ते यह अवधि करीब 50 दिन तक पहुंच सकती है।
सितंबर 2025 में इस मार्ग को लेकर पहला परीक्षण हुआ था। इस दौरान ट्रेनें करीब 20 दिनों में फेलिक्सस्टोव पहुंचीं, जिससे चीन और यूरोप के बीच परिवहन समय कम करने की क्षमता का प्रदर्शन हुआ।



