एक ही मामले में दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल करना पड़ा भारी, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लगाया 50 हजार रुपये का जुर्माना

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इलाहाबाद: अदालत से महत्वपूर्ण तथ्य छिपाकर एक ही मामले में दो बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दाखिल करना याचिकाकर्ता को भारी पड़ गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज करते हुए इसे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग और अदालत को गुमराह करने का प्रयास माना। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है।

मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने की। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता की पहली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पहले से ही लंबित थी। इस मामले में राज्य सरकार की ओर से हलफनामा भी दाखिल किया जा चुका था। इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने पहली याचिका की जानकारी छिपाते हुए उसी प्रकरण में दूसरी याचिका दाखिल कर दी।

अदालत ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग माना

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस आचरण पर कड़ी नाराजगी जताई। खंडपीठ ने कहा कि एक ही मामले में पहले से याचिका लंबित होने की जानकारी छिपाकर दूसरी याचिका दाखिल करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की इस कार्यप्रणाली के कारण बरेली के तत्कालीन एसएसपी अनुराग आर्य को अनावश्यक रूप से अदालत की नाराजगी और परेशानी का सामना करना पड़ा। कोर्ट ने एसएसपी को हुई असुविधा के लिए खेद भी जताया।

एक महीने में एसएसपी को देने होंगे 50 हजार रुपये

खंडपीठ ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता एक महीने के भीतर सीधे तत्कालीन एसएसपी अनुराग आर्य को 50 हजार रुपये का भुगतान करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित समय सीमा में रकम जमा नहीं की जाती है तो इसे राजस्व बकाये की तरह वसूल कर एसएसपी को भुगतान किया जाएगा।

इस तरह अदालत ने एक ही मामले में दो याचिकाएं दाखिल करने और महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के मामले में याचिकाकर्ता पर आर्थिक दंड लगाते हुए दोनों याचिकाएं खारिज कर दीं।

 

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