एक्टर बनने से पहले की कहानी, सौरभ शुक्ला ने शेयर किया दिलचस्प सफर!

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नई दिल्ली : हिंदी सिनेमा के दमदार कलाकार सौरभ शुक्ला आज भले ही इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान रखते हों, लेकिन उनका सफर आसान नहीं रहा। हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने अपने करियर के उस मुश्किल दौर को याद किया, जब सफलता मिलने के बावजूद उन्हें मनचाहा काम नहीं मिल रहा था। यह वही समय था जब उन्होंने खुद को एक्टर नहीं, बल्कि राइटर बताना शुरू कर दिया था।

साल 1998 में आई सत्या में सौरभ शुक्ला ने ‘कल्लू मामा’ का किरदार निभाया था, जिसने उन्हें रातों-रात पहचान दिलाई। राम गोपाल वर्मा की इस फिल्म के बाद लोग उनके अभिनय के कायल हो गए थे, लेकिन सौरभ के मुताबिक, करियर में वैसा बदलाव नहीं आया जैसा उन्होंने सोचा था।

लगातार निराशा और अच्छे रोल्स की कमी के चलते सौरभ शुक्ला डिप्रेशन में चले गए थे। उन्होंने खुलासा किया कि उस समय वह फिल्ममेकर्स से कहने लगे थे—“मैं एक्टर नहीं हूं, मैं राइटर हूं।” यह उनके करियर का सबसे कठिन दौर था, जहां उन्हें अपनी पहचान तक छिपानी पड़ी।

सौरभ शुक्ला के करियर में असली बदलाव साल 2012-13 में आया। बर्फी! और खासतौर पर जॉली एलएलबी ने उनकी किस्मत पलट दी। ‘जॉली एलएलबी’ में जज त्रिपाठी के किरदार ने उन्हें न सिर्फ दर्शकों का प्यार दिलाया, बल्कि उन्हें नेशनल फिल्म अवॉर्ड भी मिला।इस फिल्म के बाद इंडस्ट्री का नजरिया पूरी तरह बदल गया और लोग उन्हें एक बेहतरीन एक्टर के तौर पर पहचानने लगे। उनकी डिमांड और फीस दोनों में इजाफा हुआ। ‘जॉली एलएलबी’ के बाद सौरभ शुक्ला का करियर नई ऊंचाइयों पर पहुंच गया। लोग उन्हें अपने पसंदीदा कलाकारों में गिनने लगे और उन्हें लगातार बेहतर और दमदार रोल मिलने लगे।