SC का बड़ा फैसला, इन मामलों में गिरफ्तारी से पहले आरोपी को नोटिस अनिवार्य

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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से जुड़े कानूनों की व्याख्या करते हुए एक अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि जिन मामलों में अधिकतम सात साल तक की कैद का प्रावधान है, उनमें पुलिस किसी व्यक्ति को सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत पहले नोटिस देना अनिवार्य होगा।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी पुलिस का एक वैधानिक अधिकार जरूर है, लेकिन यह कोई अनिवार्य प्रक्रिया नहीं है। इसका उद्देश्य केवल जांच को सुचारु बनाना है, न कि हर मामले में आरोपी को हिरासत में लेना।

सुप्रीम कोर्ट यह जांच कर रहा था कि क्या सात साल तक की सजा वाले सभी अपराधों में BNSS की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना जरूरी है। इस पर पीठ ने साफ किया कि सात साल या उससे कम कारावास की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी तब तक नहीं की जा सकती, जब तक पहले नोटिस नहीं दिया जाता।

कोर्ट ने कहा, “BNSS, 2023 की धारा 35(3) के अंतर्गत आरोपी या संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी करना उन अपराधों में नियम है, जिनमें सात साल तक की कैद का प्रावधान है।” अदालत ने आगे यह भी जोड़ा कि भले ही धारा 35(1)(b) में गिरफ्तारी की शर्तें मौजूद हों, फिर भी गिरफ्तारी तभी होगी जब वह पूरी तरह आवश्यक हो।

अदालत के अनुसार, किसी व्यक्ति को हिरासत में लेना तभी उचित है, जब वह कम से कम एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक हो। इनमें आगे अपराध की रोकथाम, निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना, सबूतों से छेड़छाड़ रोकना, गवाहों की सुरक्षा या आरोपी की अदालत में उपस्थिति सुनिश्चित करना शामिल है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि वैध गिरफ्तारी के लिए BNSS की धारा 35(1)(बी)(i) का पालन और धारा 35(1)(बी) में वर्णित कम से कम एक शर्त का पूरा होना जरूरी है। हालांकि, इन शर्तों के मौजूद होने के बावजूद गिरफ्तारी अनिवार्य नहीं हो जाती। पुलिस अधिकारी को अपने विवेक का प्रयोग करने का अधिकार है। साथ ही, अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि गिरफ्तारी करने या न करने—दोनों ही स्थितियों में पुलिस को अपने निर्णय के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 35(3) का हवाला देते हुए कहा कि सात साल तक की सजा वाले मामलों में इस प्रावधान को धारा 35(1)(बी) और उससे जुड़े नियमों के साथ पढ़ा जाना चाहिए। यदि आरोपी नोटिस का पालन करता है और जांच एजेंसियों के सामने उपस्थित होता है, तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह बात BNSS की धारा 35(5) में भी स्पष्ट रूप से कही गई है।

अदालत ने कहा, “हमें यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि सात साल तक के कारावास वाले अपराधों में बीएनएसएस, 2023 की धारा 35(3) के तहत नोटिस जारी करना नियम है, जबकि धारा 35(1)(बी) के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 35(6) के तहत गिरफ्तारी एक अपवाद है।”

पीठ ने दोहराया कि गिरफ्तारी कोई बाध्यता नहीं, बल्कि पुलिस के विवेक पर आधारित वैधानिक शक्ति है। हर मामले में गिरफ्तारी की आवश्यकता का अलग-अलग मूल्यांकन किया जाना चाहिए। सात साल तक की सजा वाले मामलों में नोटिस जारी करना सामान्य प्रक्रिया है और गिरफ्तारी केवल तभी की जानी चाहिए, जब वह पूरी तरह उचित और अपरिहार्य हो। अदालत ने अंत में यह भी स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने के बाद भी गिरफ्तारी कोई सामान्य अधिकार नहीं बन जाती। इसके लिए पुलिस को अत्यधिक सावधानी और संयम बरतना होगा।