भारत के रक्षा निर्यात में ब्रह्मोस का दबदबा, पूरी तरह स्वदेशी मिसाइल बनाने की तैयारी तेज; CEO जयतीर्थ जोशी ने बताया अगला प्लान

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नई दिल्ली: भारत की सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस को पूरी तरह स्वदेशी बनाने की दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है। ब्रह्मोस एयरोस्पेस के प्रबंध निदेशक और सीईओ डॉ. जयतीर्थ आर. जोशी के मुताबिक, भारत के सैन्य निर्यात में ब्रह्मोस की अहम भूमिका है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिसाइल के इस्तेमाल के बाद इसकी मारक क्षमता और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को लेकर चर्चा और तेज हुई है। कंपनी अब इसके हल्के और नए संस्करण विकसित करने के साथ उत्पादन क्षमता और आपूर्ति व्यवस्था को भी मजबूत बनाने में जुटी है।

ब्रह्मोस को भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना में शामिल किया जा चुका है। इसकी मारक क्षमता, सटीक निशाना और रफ्तार इसे भारत के प्रमुख रक्षा हथियारों में शामिल करते हैं। अब कंपनी ब्रह्मोस-एनजी यानी अगली पीढ़ी की मिसाइल विकसित कर रही है, जिसका उद्देश्य भारत की हवा से हमला करने की क्षमता को और मजबूत करना है।

रक्षा निर्यात में ब्रह्मोस की बड़ी भूमिका

भारत का रक्षा निर्यात सालाना 62.7 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 38,400 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस बढ़ोतरी में ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली का महत्वपूर्ण योगदान बताया जा रहा है।

डॉ. जयतीर्थ जोशी ने बताया कि ब्रह्मोस के निर्यात की सफलता की शुरुआत वर्ष 2025 में इसके युद्धक परीक्षण से पहले ही हो गई थी। वर्ष 2022 में कंपनी को पहला बड़ा निर्यात आदेश मिला था। उनके अनुसार, करोड़ों डॉलर के इस समझौते ने वैश्विक बाजार में भारत के रक्षा निर्यात की संभावनाओं को मजबूती दी।

उन्होंने कहा कि फिलीपींस के साथ पहली निर्यात डील के बाद इस साल दक्षिण-पूर्व एशिया के दो अन्य देशों के साथ भी समझौते किए गए हैं। फिलीपींस, इंडोनेशिया और वियतनाम को मिले आदेशों और आपूर्ति के साथ ब्रह्मोस का निर्यात 600 मिलियन डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है।

बढ़ती मांग के लिए आपूर्ति व्यवस्था मजबूत करने की तैयारी

ब्रह्मोस की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए कंपनी उत्पादन व्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला का विस्तार कर रही है। डॉ. जोशी के मुताबिक, हैदराबाद, नागपुर, पिलानी और लखनऊ स्थित उत्पादन इकाइयों में तेजी से काम चल रहा है।

कंपनी हर प्रणाली और उसके अलग-अलग हिस्सों के लिए औद्योगिक भागीदारों की संख्या बढ़ाने की तैयारी में है। जिन क्षेत्रों में फिलहाल एक या दो उद्योगों पर निर्भरता है, वहां 45 आपूर्तिकर्ता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। इससे उत्पादन में प्रतिस्पर्धा बढ़ने, गुणवत्ता सुधारने और लागत को बेहतर बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।

2027-28 तक तैयार हो सकता है ब्रह्मोस-एनजी का पहला नमूना

ब्रह्मोस के भविष्य के विकास में ब्रह्मोस-एनजी को अहम माना जा रहा है। यह मौजूदा मिसाइल का छोटा और हल्का संस्करण होगा। इसे सीमित जगह में तैनात करने और विमानों से इस्तेमाल करने के लिहाज से विकसित किया जा रहा है। इसका विकास भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) और रूस की एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया के सहयोग से किया जा रहा है।

डॉ. जोशी ने उम्मीद जताई कि वर्ष 2027 या 2028 तक इसका पहला नमूना तैयार हो जाएगा। उन्होंने बताया कि नई प्रणाली में स्वदेशी तकनीक और उन्नत सामग्रियों का अधिक इस्तेमाल किया जाएगा। इसके लिए बड़े स्तर पर अनुसंधान और विकास की जरूरत होगी।

1,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाले संस्करण पर भी काम

ब्रह्मोस एयरोस्पेस 1,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाले प्रहारक संस्करण पर भी काम कर रहा है। कंपनी के अनुसार, मिसाइल का जमीन, समुद्र और हवा से परीक्षण किया जा चुका है। शुरुआती 290 किलोमीटर की सीमा से आगे इसकी क्षमता विकसित करने पर भी काम हुआ है। हालांकि, 1,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाला संस्करण अभी अवधारणा के स्तर पर है।

नौसेना के लिए फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर का अनुबंध

रक्षा मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को भारतीय नौसेना के जहाजों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर खरीदने के लिए ब्रह्मोस एयरोस्पेस के साथ अनुबंध किया। इस परियोजना में कम से कम 68 प्रतिशत स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल किया जाएगा। इसमें सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों सहित कई भारतीय उद्योगों की भागीदारी होगी।

डॉ. जोशी के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के बाद ब्रह्मोस ने उच्च तीव्रता वाले और कई मोर्चों पर लड़े जाने वाले आधुनिक युद्ध में अपनी उपयोगिता साबित की है। कंपनी स्वदेशीकरण, निर्यात, उत्पादन विस्तार और नई पीढ़ी की मिसाइलों के विकास के जरिए इसकी क्षमताओं को आगे बढ़ाने पर काम कर रही है।

 

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