दिसंबर में फिर बढ़ सकती हैं ब्याज दरें, रेपो रेट में 50 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ोतरी का अनुमान; महंगाई और रुपये पर दबाव से RBI सतर्क
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) की एक रिपोर्ट में दिसंबर की बैठक में 50 बेसिस प्वाइंट तक नीतिगत बदलाव की संभावना जताई गई है। इसके तहत रेपो रेट में सीधे 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की जा सकती है। दूसरा विकल्प रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की वृद्धि के साथ तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के कॉरिडोर में 25 बेसिस प्वाइंट का बदलाव करना हो सकता है।
एसबीआई के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर डॉ. सौम्य कांति घोष के मुताबिक, महंगाई का दबाव बढ़ रहा है और रुपये की कमजोरी भी चिंता का विषय बनी हुई है। ऐसे में आरबीआई को आर्थिक परिस्थितियों पर करीबी नजर रखते हुए संतुलित नीतिगत फैसले लेने की जरूरत है।
नवंबर तक 6.5 प्रतिशत से नीचे रह सकती है महंगाई
डॉ. घोष ने अनुमान जताया कि नवंबर तक महंगाई दर 6.5 प्रतिशत से नीचे रह सकती है। हालांकि, मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए केंद्रीय बैंक के लिए सतर्क निगरानी बनाए रखना जरूरी होगा।
डीबीएस बैंक की सीनियर इकोनॉमिस्ट और एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर राधिका राव के अनुसार, अक्टूबर की एमपीसी बैठक में आरबीआई का सख्त रुख साफ दिखाई दिया। बैठक में रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की गई और नीतिगत रुख को ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ यानी चरणबद्ध मौद्रिक सख्ती में बदला गया।
उनके मुताबिक, समिति के सदस्यों ने महंगाई के बढ़ते दबाव और मजबूत आर्थिक वृद्धि को ब्याज दरों में बढ़ोतरी के प्रमुख कारणों के तौर पर देखा।
महंगाई बढ़ने से पहले कदम उठाने पर जोर
महंगाई के जोखिम को देखते हुए समय रहते नीतिगत कदम उठाने की जरूरत पर भी जोर दिया गया है। हालांकि, समिति के कुछ सदस्य ब्याज दरों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी के पक्ष में रहे और लंबे समय तक सख्त मौद्रिक नीति जारी रहने के स्पष्ट संकेत देने से बचते नजर आए।
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया कि महंगाई का दबाव व्यापक रूप लेता दिखाई दे रहा है। राधिका राव के आकलन के मुताबिक, यदि चालू कैलेंडर वर्ष की चौथी तिमाही में महंगाई दर करीब 6 प्रतिशत तक पहुंचती है, तो दिसंबर में रेपो रेट में एक और बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है।
रुपये को मिला सहारा, लेकिन कच्चे तेल की कीमतें चुनौती
विदेशी मुद्रा बाजार में उठाए गए कदमों के बाद रुपये को मजबूती मिली है। इस महीने डॉलर के मुकाबले रुपया करीब डेढ़ प्रतिशत मजबूत हुआ है। इसके बावजूद कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक अनिश्चितताएं भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनी हुई हैं।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, देश के सबसे बड़े इक्विटी आईपीओ में विदेशी निवेश बढ़ने से भी रुपये को सहारा मिला है। फिलहाल रुपया वैश्विक घटनाक्रमों पर सीमित प्रतिक्रिया दे रहा है, लेकिन कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के कारण बॉन्ड बाजार पर दबाव बना रह सकता है।





