भारत की 1500 किमी रेंज वाली हाइपरसोनिक मिसाइल की तैयारी, दुश्मन के युद्धपोतों को दूर से निशाना बनाने की क्षमता
नई दिल्ली: भारत अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने के लिए हाइपरसोनिक हथियारों के विकास पर काम कर रहा है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM), जिसे LRHM भी कहा गया है, को लेकर दावा है कि इसे 2027 से 2029 के बीच सशस्त्र बलों में शामिल करने की योजना है। इसकी संभावित मारक क्षमता करीब 1500 किलोमीटर बताई जा रही है। हाइपरसोनिक गति से उड़ने वाली यह मिसाइल दुश्मन के युद्धपोतों को निशाना बनाने के लिए विकसित की जा रही है।
दो चरणों वाले रॉकेट से मिलेगी हाइपरसोनिक रफ्तार
LR-AShM को बूस्ट-ग्लाइड हाइपरसोनिक मिसाइल के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसकी उड़ान के शुरुआती चरण में दो चरणों वाला ठोस ईंधन रॉकेट मोटर काम करता है। इसके बाद हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ता है।
उपलब्ध विवरणों के मुताबिक, इसकी अधिकतम गति करीब 12,348 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है। इस रफ्तार से 1500 किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग 15 मिनट लगने का अनुमान है। हालांकि, वास्तविक उड़ान का समय मिसाइल के मार्ग और परिचालन परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
दुश्मन के युद्धपोतों को निशाना बनाने पर जोर
इस मिसाइल का प्रमुख उद्देश्य समुद्र में मौजूद दुश्मन के युद्धपोतों को निशाना बनाना है। इसे स्थिर और गतिशील लक्ष्यों के खिलाफ इस्तेमाल करने की क्षमता के साथ विकसित किए जाने की बात कही गई है।
इसकी उड़ान का रास्ता बदलने की क्षमता और तेज गति दुश्मन की निगरानी तथा मिसाइल रोधी प्रणालियों के लिए चुनौती पैदा कर सकती है। इसके अलावा, स्वदेशी सेंसर और एवियोनिक्स प्रणाली के जरिए इसकी दिशा निर्धारित करने और लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता बेहतर बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
भारतीय नौसेना को कैसे मिलेगी मजबूती?
LR-AShM को मुख्य रूप से भारतीय नौसेना की तटीय मिसाइल बैटरियों के लिए विकसित किए जाने की जानकारी दी गई है। भविष्य में इसके जहाजों और विमानों से प्रक्षेपित किए जाने वाले संस्करणों की संभावना भी जताई गई है।
यदि यह मिसाइल योजना के अनुसार विकसित होकर सेवा में शामिल होती है, तो इससे भारतीय नौसेना की समुद्री क्षेत्र में दूर तक हमला करने की क्षमता बढ़ सकती है। हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने के लिहाज से इसे महत्वपूर्ण परियोजना माना जा रहा है।
परीक्षण और उत्पादन को लेकर क्या है योजना?
मिसाइल के विकास, परीक्षण और उत्पादन को लेकर कई दावे सामने आए हैं। उपलब्ध विवरण में ओडिशा तट पर परीक्षणों के दौरान लंबी दूरी और अंतिम चरण में लक्ष्य की ओर मार्गदर्शन की क्षमता का उल्लेख किया गया है। इसे सशस्त्र बलों में शामिल करने से पहले उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षणों की प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी।
उत्पादन के शुरुआती चरण में हर साल 10 से 15 मिसाइलें तैयार करने और बाद में इस संख्या को बढ़ाकर 25 से 40 तक पहुंचाने की योजना बताई गई है। हालांकि, परीक्षणों की मौजूदा स्थिति, उत्पादन कार्यक्रम और सेवा में शामिल किए जाने की समयसीमा की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
ब्रह्मोस से कितनी अलग होगी यह मिसाइल?
भारत की ब्रह्मोस मिसाइल सुपरसोनिक गति से उड़ने वाली प्रमुख मिसाइलों में शामिल है, जबकि LR-AShM को हाइपरसोनिक तकनीक पर आधारित बताया गया है। दोनों की तकनीक, उड़ान का तरीका और परिचालन भूमिका अलग हो सकती है।
हाइपरसोनिक मिसाइलों की तेज गति और संभावित रूप से बदलते उड़ान मार्ग के कारण उन्हें रोकना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, किसी भी मिसाइल की वास्तविक प्रभावशीलता उसकी सटीकता, परीक्षण परिणामों, लक्ष्य पहचान प्रणाली और विरोधी की रक्षा क्षमता पर भी निर्भर करती है।
विकास में तकनीकी चुनौतियां भी कम नहीं
हाइपरसोनिक मिसाइल तैयार करना तकनीकी रूप से जटिल काम है। अत्यधिक तापमान सहने वाली सामग्री, सटीक मार्गदर्शन, प्रणोदन प्रणाली और उड़ान के दौरान नियंत्रण बनाए रखना इसकी प्रमुख चुनौतियों में शामिल हैं।
इस परियोजना की प्रगति भारत के स्वदेशी रक्षा अनुसंधान और हथियार निर्माण कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, इसकी रेंज को भविष्य में 3000 किलोमीटर तक बढ़ाने और थल सेना तथा वायु सेना के लिए अलग संस्करण विकसित करने जैसी संभावनाओं को अभी योजनाओं या दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।





