दुनिया के टॉप 2% वैज्ञानिकों में पुणे के डीवाई पाटिल मेडिकल कॉलेज के 3 शोधकर्ता शामिल, जानिए किस क्षेत्र में है खास योगदान

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पुणे: भारत के चिकित्सा और जनस्वास्थ्य अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़ी एक अहम उपलब्धि सामने आई है। अमेरिका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की वर्ष 2026 की दुनिया के शीर्ष 2 प्रतिशत वैज्ञानिकों की सूची में पुणे स्थित डॉ. डीवाई पाटिल मेडिकल कॉलेज, अस्पताल और अनुसंधान केंद्र के तीन वैज्ञानिकों ने जगह बनाई है। इनमें प्रोफेसर एमेरिटस डॉ. अमिताव बनर्जी, डॉ. सारिका चतुर्वेदी और डॉ. सचिन अत्रे शामिल हैं। इन वैज्ञानिकों को शोध और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए इस वैश्विक सूची में स्थान मिला है।

डॉ. अमिताव बनर्जी: चार दशक से अधिक का शोध अनुभव

डॉ. अमिताव बनर्जी को उनके दीर्घकालीन शोध योगदान के लिए करियर-लॉन्ग श्रेणी में शामिल किया गया है। उन्हें महामारी विज्ञान के क्षेत्र में चार दशकों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने टाइफाइड, हेपेटाइटिस, निमोनिया और जनजातीय क्षेत्रों में मलेरिया जैसी बीमारियों पर गहन शोध किया है।

वर्ष 2000 से 2004 के बीच उन्होंने भारतीय सशस्त्र बलों की मोबाइल महामारी जांच टीम का नेतृत्व भी किया था। संक्रामक रोगों और उनके प्रसार से जुड़े अध्ययन में उनके लंबे अनुभव को इस उपलब्धि का अहम हिस्सा माना गया है।

डॉ. सारिका चतुर्वेदी: योग और पारंपरिक चिकित्सा पर शोध

डॉ. सारिका चतुर्वेदी सार्वजनिक स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में शोध कर रही हैं। उन्होंने स्वीडन के प्रतिष्ठित कैरोलिंस्का संस्थान से पीएचडी की है। उनका शोध पारंपरिक चिकित्सा और योग के वैज्ञानिक प्रभावों पर केंद्रित है।

उन्होंने भारत सरकार के सामान्य योग प्रोटोकॉल के मानव मस्तिष्क पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने के लिए चिकित्सकीय परीक्षण किए हैं। वह लैंसेट सिटिजंस कमीशन की फेलो हैं और विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र के साथ भी काम कर रही हैं।

डॉ. सचिन अत्रे: टीबी और संक्रामक रोगों पर विशेष काम

डॉ. सचिन अत्रे चिकित्सा मानवशास्त्र के विशेषज्ञ हैं और उन्हें इस क्षेत्र में दो दशकों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से पीएचडी की है और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से फुलब्राइट-नेहरू फेलोशिप प्राप्त की है।

उनका शोध मुख्य रूप से तपेदिक (टीबी), दवा-प्रतिरोधी टीबी, कुपोषण और कुष्ठ रोग जैसे विषयों पर केंद्रित रहा है। वह विश्व स्वास्थ्य संगठन के वैश्विक टीबी कार्यक्रम के सलाहकार भी रह चुके हैं।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, डॉ. अत्रे के 80 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं और उनके शोध कार्यों को दुनिया भर में 52,000 से अधिक बार उद्धृत किया गया है।

छात्रों और युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणा

इस उपलब्धि पर डॉ. डीवाई पाटिल विद्यापीठ के कुलाधिपति डॉ. पी. डी. पाटिल और प्रो-कुलाधिपति डॉ. भाग्यश्री पी. पाटिल ने तीनों वैज्ञानिकों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि दर्शाती है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय स्तर का गुणवत्तापूर्ण शोध किया जा रहा है।

वैज्ञानिकों की इस सफलता को चिकित्सा, संक्रामक रोगों और जनस्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले विद्यार्थियों तथा युवा शोधकर्ताओं के लिए प्रेरणादायक माना जा रहा है।

 

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