कानपुर में हर दिन 33 लाख रुपये से ज्यादा की साइबर ठगी, 100 करोड़ की रकम डूबी; अब पीड़ितों को वापसी की उम्मीद
पुलिस और साइबर सेल ने कार्रवाई करते हुए अब तक 151 आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है। वहीं, चारों जोन की साइबर सेल ठगी की रकम में से करीब 2 करोड़ 20 लाख 40 हजार 567 रुपये ही फ्रीज करा सकी है। यह कुल ठगी गई रकम का लगभग दो प्रतिशत है। अधिकारियों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से बैंकों को जवाबदेह बनाने से जुड़े आदेश के बाद साइबर ठगी के पीड़ितों को अपनी रकम वापस मिलने की उम्मीद बढ़ सकती है।
दो साल में 5459 बैंक खाते कराए गए फ्रीज
साइबर अपराधियों को ठगी की रकम इधर-उधर भेजने और निकालने के लिए बैंक खातों की जरूरत होती है। इसके लिए वे म्यूल खातों का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे खाते बेरोजगारों, छात्रों, ग्रामीणों और जरूरतमंद लोगों को लालच देकर खुलवाए जाते हैं। इसके बाद ठग उनसे एटीएम कार्ड, पासबुक और चेकबुक भी अपने कब्जे में ले लेते हैं। कई मामलों में खातों को किराये पर लेने की बात भी सामने आई है।
साइबर सेल के एक अधिकारी के मुताबिक, ठगी में इस्तेमाल होने वाले पहले और दूसरे स्तर के खातों को फ्रीज कराया जाता है। जनवरी 2025 से अक्टूबर 2026 तक कुल 5459 बैंक खाते फ्रीज कराए जा चुके हैं।
डिजिटल अरेस्ट के सात मामले आए सामने
वर्ष 2025 में कानपुर में डिजिटल अरेस्ट के 17 से अधिक मामले सामने आए थे। वहीं, इस साल जागरूकता अभियान के बाद जनवरी से अब तक ऐसे सात मामले दर्ज किए गए हैं। इन मामलों में पुलिस ने 13 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है।
2026 में साइबर ठगी के आंकड़े
- साइबर ठगी के 272 मामले दर्ज हुए
- 151 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया
- 85 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए
- 100 करोड़ 9 लाख 24 हजार 55 रुपये की ठगी हुई
- 2 करोड़ 20 लाख 40 हजार 567 रुपये फ्रीज कराए गए
2025 में साइबर ठगी के आंकड़े
- साइबर ठगी के 429 मामले दर्ज हुए
- 104 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया
- 102 मामलों में आरोपपत्र दाखिल किए गए
- 41 करोड़ 97 लाख 10 हजार 240 रुपये की ठगी हुई
- 1 करोड़ 85 लाख 59 हजार 835 रुपये फ्रीज कराए गए
ठगी के बाद बैंक ने नहीं की मदद, कारोबारी के 2.66 करोड़ रुपये डूबे
जाजमऊ की डिफेंस कॉलोनी निवासी मोहम्मद अहमद लारी सेफ्टी शूट और हॉर्स जीन के निर्यातक हैं। उनके मुताबिक, फेसबुक के जरिए अनन्या कुलकर्णी नाम की महिला ने उनसे संपर्क किया और फिनसोल प्राइवेट लिमिटेड में निवेश कर अधिक मुनाफा दिलाने का झांसा दिया। करीब दो महीने के दौरान उनसे कई बार में 2.66 करोड़ रुपये निवेश कराए गए।
अहमद ने जब निवेश की बढ़ी हुई रकम 9,74,81,459.78 रुपये निकालने की कोशिश की तो उनसे 30 लाख रुपये और मांगे गए। इसके बाद उन्होंने अपने चार्टर्ड अकाउंटेंट से जांच कराई, तब उन्हें ठगी का पता चला। साइबर सेल ने मामला दर्ज कर 30 लाख रुपये होल्ड करा दिए। अहमद का आरोप है कि ठगी की जानकारी मिलने के बाद बैंकों की ओर से उन्हें कोई उचित मदद नहीं मिली।
बैंक ने नियमों का हवाला देकर पुलिस के पास भेजा
हरवंश मोहाल निवासी शिवा साहू से शेयर ट्रेडिंग में अधिक मुनाफा दिलाने का झांसा देकर 23.16 लाख रुपये ठग लिए गए। शिवा के मुताबिक, 14 अगस्त को अदिति जाधव नाम की महिला ने उनसे व्हाट्सऐप पर संपर्क किया था। उसने शेयर बाजार में कमाई का लालच देकर एक ऐप डाउनलोड कराया।
इसके बाद 15 सितंबर से 8 अक्टूबर 2026 के बीच उनसे अलग-अलग किस्तों में 23.16 लाख रुपये ट्रांसफर करा लिए गए। शिवा ने साइबर सेल में शिकायत करने के बाद बैंक से भी संपर्क किया, लेकिन बैंक अधिकारियों ने मदद करने से हाथ खड़े कर दिए। उन्होंने कई नियमों और प्रावधानों का हवाला देते हुए उन्हें पुलिस के पास जाने को कहा।
शिवा का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश से बैंकों की जवाबदेही तय होगी तो साइबर ठगी की घटनाओं पर काफी हद तक रोक लग सकती है।
हर साइबर ठगी में बैंक नहीं देगा पैसा, जानिए क्या हैं नियम
बैंक ऑफ इंडिया ऑफिसर्स ऑर्गनाइजेशन के प्रदेश महामंत्री अंकित अवस्थी के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नियमों के तहत अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन में ग्राहक की जिम्मेदारी मामले की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
अगर धोखाधड़ी बैंक की गलती या लापरवाही के कारण हुई है तो ग्राहक की जिम्मेदारी नहीं बनती। लेकिन यदि ग्राहक ने अपनी भुगतान संबंधी गोपनीय जानकारी किसी के साथ साझा की है तो बैंक को सूचना देने से पहले हुए नुकसान की जिम्मेदारी ग्राहक पर आ सकती है।
इसी तरह, यदि कोई ग्राहक खुद ठग के कहने पर यूपीआई से भुगतान करता है या रकम ट्रांसफर करता है तो उसे स्वतः रिफंड मिलने की गारंटी नहीं होती। ऐसे मामलों में लेन-देन की परिस्थितियों और बैंक की जांच के आधार पर फैसला किया जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, साइबर ठगी का शिकार होने पर लेन-देन से जुड़े संदेश और शिकायत संख्या सुरक्षित रखनी चाहिए। बैंक और संबंधित एजेंसियों को समय पर सूचना देने से ठगी की रकम को रोकने और नुकसान की भरपाई की संभावना बढ़ सकती है।





