यूनुस के प्रेस सचिव की पोस्ट से बांग्लादेश में कानून-व्यवस्था पर उठे सवाल, अल्पसंख्यकों और मीडिया संस्थानों की सुरक्षा पर भी बढ़ी चिंता
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के प्रेस सचिव शफीकुल आलम की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने देश में कानून-व्यवस्था और आम नागरिकों, विशेषकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।
प्रेस सचिव ने व्यक्त किए मीडिया संस्थानों पर हुए हिंसक हमलों के दौरान अपनी ‘बेबस स्थिति’
प्रेस सचिव द्वारा मीडिया संस्थानों पर हुए हिंसक हमलों के दौरान अपनी ‘बेबस स्थिति’ व्यक्त किए जाने के बाद, बांग्लादेश के प्रमुख बंगाली अखबार प्रथम आलो ने सवाल उठाया, “यदि सरकार के प्रभावशाली लोग ही खुद को असहाय बता रहे हैं, तो आम लोग कहां जाएं?”
मदद के लिए कई जगह किया संपर्क, लेकिन समय पर सहायता नहीं पहुंची
दरअसल, 19 दिसंबर को शफीकुल आलम ने अपने आधिकारिक फेसबुक अकाउंट पर लिखा कि 18 दिसंबर की रात उन्हें द डेली स्टार और प्रथम आलो के पत्रकार मित्रों के घबराए हुए फोन आए थे। उन्होंने मदद के लिए कई जगह संपर्क किया, लेकिन समय पर सहायता नहीं पहुंच सकी।
मुझे बेहद अफसोस है कि मैं अपने पत्रकार मित्रों की मदद नहीं कर सका
उन्होंने लिखा, “मुझे बेहद अफसोस है कि मैं अपने पत्रकार मित्रों की मदद नहीं कर सका। मैंने कई लोगों को फोन किया, सहायता जुटाने की कोशिश की, लेकिन वह समय पर नहीं पहुंच सके।” गौरतलब है कि 18 दिसंबर की रात ढाका में इन दोनों प्रमुख मीडिया संस्थानों के दफ्तरों पर हिंसक भीड़ ने हमला किया। आलम के अनुसार, कर्मचारियों के साथ मारपीट की गई, दफ्तरों में तोड़फोड़ हुई और आगजनी की गई।
पूर्व पत्रकार होने के नाते मैं शर्मिंदा हूं

उन्होंने बताया कि तड़के करीब 5 बजे उन्हें सूचना मिली कि द डेली स्टार में फंसे सभी पत्रकार सुरक्षित बाहर निकाल लिए गए हैं, लेकिन तब तक दोनों अखबार देश के सबसे गंभीर भीड़-हमलों में से एक का सामना कर चुके थे। अपनी पोस्ट के अंत में आलम ने लिखा, “मैं नहीं जानता कि आपको सांत्वना देने के लिए कौन से शब्द पर्याप्त होंगे। एक पूर्व पत्रकार होने के नाते मैं शर्मिंदा हूं।”
यह हमला सीधे तौर पर राज्य की विफलता को दर्शाता है
इस पोस्ट पर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। एक यूजर ने लिखा कि यह हमला सीधे तौर पर राज्य की विफलता को दर्शाता है। दूसरे ने कहा, “यह सब आपकी अंतरिम सरकार के कार्यकाल में हुआ है। सुरक्षा सुनिश्चित न कर पाने की जिम्मेदारी से आप बच नहीं सकते।” एक अन्य यूजर ने टिप्पणी की, “यह बेहद निराशाजनक है। समय रहते आवश्यक कदम नहीं उठाए गए और अब इसके परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।”
जान बचाने के लिए पत्रकारों और कर्मचारियों को छोड़ना पड़ा दफ्तर
इस बीच, प्रथम आलो ने हमले के एक दिन बाद जारी बयान में कहा कि संभावित खतरे को देखते हुए उसने पहले ही सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और संबंधित प्राधिकरणों से सुरक्षा की मांग की थी, लेकिन मदद पहुंचने से पहले ही कार्यालय में तोड़फोड़ हो गई। अखबार के अनुसार, जान बचाने के लिए पत्रकारों और कर्मचारियों को दफ्तर छोड़ना पड़ा। बाद में पुलिस और दमकल विभाग के पहुंचने पर हालात पर काबू पाया जा सका।
जब सरकार का इतना जिम्मेदार और प्रभावशाली प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अपनी असहायता व्यक्त कर रहा है, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है
मीडिया विश्लेषक निशात सुलताना ने अपने एक कॉलम में सवाल उठाया कि जब सरकार का इतना जिम्मेदार और प्रभावशाली प्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से अपनी असहायता व्यक्त कर रहा है, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। उन्होंने लिखा कि शुरुआत से ही अंतरिम सरकार अपराध पर नियंत्रण और आपात स्थितियों से निपटने में असफल रही है, जिसके चलते कानून हाथ में लेने वाली ताकतें बार-बार हावी होती रही हैं।

