समुद्री शक्ति बनने की राह पर भारत, पर्यावरण संरक्षण को बनाया आधार
Thiruvananthapuram: Newly inaugurated Vizhinjam International Deepwater Multipurpose Seaport
भारत एक मजबूत समुद्री शक्ति बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। यह अब केवल एक दीर्घकालिक लक्ष्य नहीं रह गया है, बल्कि देश की लगभग 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर इसके ठोस संकेत साफ दिखाई देने लगे हैं।
भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, निर्यात और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूती
इंडिया नैरेटिव की एक रिपोर्ट के अनुसार, जो बंदरगाह पहले केवल सीमित व्यापार गतिविधियों तक सीमित थे, वे अब बड़े आर्थिक केंद्रों में बदल रहे हैं। इन बंदरगाहों के जरिए माल की आवाजाही में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, निर्यात और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूती मिल रही है।
दीर्घकालिक और टिकाऊ प्रगति का एकमात्र रास्ता
हालांकि, बंदरगाह गतिविधियों के विस्तार के साथ एक अहम सवाल भी सामने आया है कि समुद्री पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना और जलवायु परिवर्तन को बढ़ाए बिना विकास को कैसे आगे बढ़ाया जाए। इस चुनौती का जवाब भारत ने स्पष्ट रूप से दिया है। सरकार का मानना है कि हरित (ग्रीन) विकास कोई बाधा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक और टिकाऊ प्रगति का एकमात्र रास्ता है।
भारत का लगभग 95% विदेशी व्यापार मात्रा के लिहाज से बंदरगाहों के माध्यम से
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत का लगभग 95% विदेशी व्यापार मात्रा के लिहाज से बंदरगाहों के माध्यम से होता है। ऐसे में बंदरगाह देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाते हैं। पिछले 10 वर्षों में बड़े बंदरगाहों पर माल की आवाजाही करीब 581 मिलियन टन से बढ़कर लगभग 855 मिलियन टन तक पहुंच गई है। यह वृद्धि मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और वैश्विक सप्लाई चेन से भारत के बढ़ते जुड़ाव को दर्शाती है।
1908 के पुराने पोर्ट्स एक्ट की जगह इंडियन पोर्ट्स एक्ट, 2025 लागू
दूसरी ओर, बंदरगाह वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत भी रहे हैं। कई बंदरगाह मैंग्रोव जंगलों, दलदली इलाकों, कोरल रीफ और घनी आबादी वाले तटीय शहरों के नजदीक स्थित हैं, जिससे पर्यावरणीय जोखिम और बढ़ जाता है। इस दिशा में एक बड़ा बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है। 1908 के पुराने पोर्ट्स एक्ट की जगह इंडियन पोर्ट्स एक्ट, 2025 लागू किया गया है, जिसे समुद्री प्रशासन में एक ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। इसके तहत पर्यावरण सुरक्षा को सीधे कानून का हिस्सा बनाया गया है। अब टिकाऊ विकास कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्य शर्त बन चुका है।

मैरीटाइम इंडिया विजन 2030, जिसमें बंदरगाहों के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता
इस सोच का केंद्र ‘मैरीटाइम इंडिया विजन 2030’ है, जिसमें बंदरगाहों के विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। इसे ‘हरित सागर ग्रीन पोर्ट गाइडलाइंस’ का भी समर्थन प्राप्त है, जिनके तहत स्पष्ट और मापने योग्य लक्ष्य तय किए गए हैं।
बंदरगाहों को प्रति टन माल पर कार्बन उत्सर्जन में 30% तक की लानी होगी कमी
इन लक्ष्यों के अनुसार, 2030 तक बंदरगाहों को प्रति टन माल पर कार्बन उत्सर्जन में 30% तक की कमी लानी होगी। साथ ही, बड़ी संख्या में मशीनों को बिजली से संचालित करना होगा और कुल ऊर्जा खपत का 60% से अधिक हिस्सा नवीकरणीय स्रोतों से लेना अनिवार्य होगा। इन लक्ष्यों को 2047 तक और आगे बढ़ाया जाएगा, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हरित परिवर्तन एक बार की प्रक्रिया नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाला प्रयास है।
इन बदलावों का सीधा लाभ स्थानीय समुदायों को
बंदरगाहों के रोज़मर्रा के संचालन में भी बड़े सुधार किए जा रहे हैं। ‘शोर-टू-शिप पावर सिस्टम’ के जरिए जहाज बंदरगाह पर खड़े रहने के दौरान अपने डीजल इंजन बंद कर सकते हैं, जिससे आसपास के शहरों में वायु प्रदूषण में कमी आएगी। इसके अलावा, बिजली से चलने वाली क्रेन, वाहन और माल ढोने वाली मशीनें शोर कम करने के साथ ईंधन की बचत करती हैं और श्रमिकों की सुरक्षा भी बढ़ाती हैं। इन बदलावों का सीधा लाभ उन स्थानीय समुदायों को मिलेगा, जो वर्षों से बंदरगाहों से होने वाले प्रदूषण का असर झेलते आए हैं।
जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण भी अब बंदरगाह विकास की प्राथमिकताओं में शामिल
जल प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण भी अब बंदरगाह विकास की प्राथमिकताओं में शामिल हो चुके हैं। नई तकनीकों के जरिए गंदे पानी का पुनः उपयोग, कम मात्रा में अपशिष्ट जल का निष्कासन और खुदाई से निकले पदार्थों का दोबारा इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही, मैंग्रोव वनों के पुनरुद्धार और हरियाली बढ़ाने से न केवल कार्बन अवशोषण में मदद मिलेगी, बल्कि तटीय क्षेत्रों को तूफानों और कटाव से भी सुरक्षा मिलेगी, जो जलवायु परिवर्तन के कारण अब अधिक गंभीर होते जा रहे हैं।

