घर खरीदना फायदे का सौदा या सिर्फ खर्च? 1% रूल देगा साफ जवाब

property

नई दिल्ली। अगर आप सोच रहे हैं कि घर खरीदना बेहतर है या किराए पर रहना, तो एक आसान सा नियम यानी 1% रेंट बनाम बाय रूल आपकी मदद कर सकता है। यह नियम बताता है कि कोई प्रॉपर्टी निवेश के लिहाज से सही है या नहीं, ताकि आप महंगी या कम रिटर्न देने वाली प्रॉपर्टी में पैसा लगाने से बच सकें।

1% रूल क्या है?

इस नियम के मुताबिक, कोई भी प्रॉपर्टी तभी अच्छा निवेश मानी जाती है, जब उससे मिलने वाला मासिक किराया उसकी कीमत का कम से कम 1% हो। उदाहरण के लिए, अगर किसी फ्लैट की कीमत 1 करोड़ रुपये है, तो आदर्श रूप से उसका मासिक किराया करीब 1 लाख रुपये होना चाहिए। अगर किराया इससे काफी कम है, तो उस प्रॉपर्टी को खरीदना निवेश के लिहाज से फायदा नहीं देता। हालांकि, अगर आप घर रहने के लिए खरीद रहे हैं, तो सिर्फ आंकड़े नहीं, बल्कि स्कूल, ऑफिस की दूरी, सुविधाएं और लाइफस्टाइल जैसी चीजें भी मायने रखती हैं।

इस रूल का इस्तेमाल कैसे करें?

अपने इलाके में मिलती-जुलती प्रॉपर्टी का किराया देखें और फार्मूला लगाएं: (मासिक किराया ÷ प्रॉपर्टी की कीमत) × 100। अगर यह आंकड़ा 1% के आसपास है, तो डील ठीक मानी जा सकती है। साथ ही मेंटेनेंस, प्रॉपर्टी टैक्स, होम लोन का ब्याज और स्टांप ड्यूटी जैसे खर्चों को भी जोड़कर देखें, क्योंकि ये आपके रिटर्न को काफी प्रभावित करते हैं।

1% रूल की सीमाएं

इस नियम में भविष्य में प्रॉपर्टी के दाम बढ़ने, होम लोन पर मिलने वाली टैक्स छूट, आपकी निजी जरूरतें और प्राथमिकताएं शामिल नहीं होतीं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक भारत में रेंटल यील्ड पहले से ही कम होती है, इसलिए यह नियम पूरी तरह फिट नहीं बैठता।

भारत में कितनी कारगर है यह नियम?

अमेरिका और यूरोप में यह नियम अधिक प्रभावी है, क्योंकि वहां किराया और ब्याज दरें संतुलित होती हैं। भारत में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टी का औसत सालाना रिटर्न करीब 2% होता है, इसलिए 1% रूल थोड़ा सख्त माना जाता है।

भारतीय होमबायर्स के लिए टिप्स

मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में घर महंगे हैं, लेकिन किराया उतना नहीं बढ़ता। ऐसे में किराए पर रहना कई बार बेहतर विकल्प हो सकता है। छोटे शहरों में किराए का रिटर्न बेहतर होता है, इसलिए वहां घर खरीदना फायदे का सौदा बन सकता है।

रेंट बनाम बाय: क्या देखें?

किराया बनाम प्राइस ग्रोथ: किराया कम हो सकता है, लेकिन प्रॉपर्टी की कीमत समय के साथ बढ़ती है।
एसेट बनता है: किराया देने से कुछ नहीं बनता, खरीदने से संपत्ति बनती है।
फ्लेक्सिबिलिटी: किराए पर रहने से जगह बदलना आसान है।
खर्च: खरीदने पर डाउन पेमेंट, EMI और मेंटेनेंस का बोझ होता है।
पर्सनल फैक्टर: नौकरी, परिवार और भविष्य की योजना अहम होती है।

इस तरह 1% रूल अपनाकर आप प्रॉपर्टी खरीदने या किराए पर रहने के बीच सही फैसला ले सकते हैं और निवेश के मामले में फायदेमंद विकल्प चुन सकते हैं।