ईरान का सऊदी पर हमला हुआ तो परमाणु युद्ध की बढ़ जाएगी संभावना, पाकिस्तान की हो सकती है एंट्री
रियाद : मिडिल ईस्ट में ईरान-इजरायल-अमेरिका जंग अब ऐसे मोड़ पर है कि एक मिसाइल हमला पूरे क्षेत्र को आग में झोंक सकता है। ईरान ने सऊदी अरब, कतर और यूएई के बड़े तेल-गैस ठिकानों को खाली करने की चेतावनी दी है। इजरायल ने ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमला किया था, जिसके जवाब में ईरान ने कतर के गैस हब को निशाना बनाया। सऊदी अरब ने मिसाइल और ड्रोन को रोकने का दावा किया, जबकि UAE की गैस फैसिलिटी को मलबे के कारण खाली करना पड़ा।
सऊदी अरब अगर लगातार ईरान हमलों के जवाब में जंग में उतरता है, तो पाकिस्तान को इसमें शामिल होना पड़ सकता है। पिछले साल सऊदी और पाकिस्तान ने द्विपक्षीय रक्षा समझौता किया था, जिसके तहत सऊदी को पाकिस्तान की सैन्य मदद मिल सकती है। सऊदी विश्लेषक सलमान अल-अंसारी के अनुसार, यह समझौता ‘न्यूक्लियर छतरी’ जैसी सुरक्षा भी देता है और इसे नाटो के आर्टिकल-5 से तुलना की जा सकती है – यानी अगर सऊदी पर हमला होता है, तो पाकिस्तान पर भी इसे हमला माना जाएगा।
हाल ही में सऊदी ने अमेरिकी एयरबेस, प्रिंस सुल्तान एयरबेस और ऊर्जा ठिकानों को ईरान के मिसाइल हमलों का सामना किया। पाकिस्तान ने सऊदी के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाई और ईरान के साथ बातचीत में यह भरोसा लिया कि उसका क्षेत्र हमलों के लिए इस्तेमाल नहीं होगा।
पाकिस्तान सऊदी का करीबी सहयोगी है, लेकिन वह खाड़ी देशों से तेल और गैस पर निर्भर है। साथ ही पाकिस्तान ईरान के साथ गैस पाइपलाइन का प्रोजेक्ट भी चला रहा है, जो अमेरिका के दबाव में पूरी नहीं हो सका। हाल ही में पाकिस्तान का ‘द कराची’ जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित निकला, जो ईरान से समझौते का संकेत माना जा रहा है। पाकिस्तान की भागीदारी से उसके जहाजों और तेल सप्लाई पर भी खतरा बढ़ सकता है।
मिडिल ईस्ट में सीधे युद्ध में सऊदी अरब की भागीदारी और पाकिस्तान की संभावित एंट्री इसे केवल क्षेत्रीय संघर्ष से आगे बढ़ाकर वर्ल्ड वार 3 के स्तर का बना सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान का हमला अब सिर्फ मिसाइल या ड्रोन तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी ऊर्जा और सुरक्षा संरचना को चुनौती दे रहा है।



