AI से बनवाया और दस्तखत कर फाइल कर दिया, दलीलें देख भड़क उठे मीलॉर्ड! ठोका ₹50,000 का जुर्माना

bombay_high_court_1733035751389_1768540740553

बॉम्बे हाई कोर्ट ने अदालत में बिना जाँच-पड़ताल के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार की गई कानूनी दलीलें दाखिल करने की प्रवृत्ति पर कड़ी नाराजगी जताई है। हाल ही में अदालत ने एक ऐसे ही मामले में एक प्रतिवादी पर 50,000 रुपये का जुर्माना ठोक दिया, जिसमें लिखित दलीलों में एक ऐसे फैसले को उद्धृत किया गया था, जो वास्तविकता में अस्तित्व में था ही नहीं। जस्टिस एम.एम. साठये ने इस मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत में मशीन द्वारा तैयार की गई सामग्री को बिना सत्यापन के “डंप” करना न्याय की त्वरित प्रक्रिया में बाधा है।

मामले में हाई कोर्ट ने पाया कि हार्ट एंड सोल एंटरटेनमेंट कंपनी के निदेशक मोहम्मद यासीन द्वारा दाखिल की गई लिखित दलीलों में AI टूल्स (जैसे ChatGPT) के स्पष्ट संकेत मौजूद थे। इनमें एक जैसी भाषा दोहराई गई थी और विशिष्ट टिक-मार्क और मशीन-स्टाइल लेखन शामिल था। इस याचिका के साथ सबसे गंभीर बात ये रही कि दलीलों में ‘Jyoti w/o Dinesh Tulsiani बनाम Elegant Associates’ नामक एक फैसले का हवाला दिया गया था,लेकिन न तो अदालत और न ही उसके लॉ क्लर्क्स इस फैसले का रेफरेंस ढूंढ़ पाए।

AI का उपयोग करें, लेकिन जिम्मेदारी के साथ
इस पर नाराजगी जताते हुए जस्टिस साठये ने स्पष्ट किया, “अगर रिसर्च के लिए AI टूल्स का इस्तेमाल किया जाता है, तो वह स्वागतयोग्य है लेकिन ऐसे टूल्स का इस्तेमाल करने वाले पक्ष या वकील की यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वह सभी रेफरेंस और उद्धरणों की जाँच करे और यह सुनिश्चित करें कि वे वास्तविक, प्रासंगिक और अस्तित्व में हों।” अदालत ने इस बात पर भी नाराज़गी जताई कि यासीन ने बिना सामग्री सत्यापित किए AI से जेनरेटेड कंटेंट पर केवल हस्ताक्षर कर लिखित दलीलें दाखिल कर दीं।

कोर्ट की कड़ी चेतावनी
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने कहा, “अदालत पर गैर-जरूरी या अस्तित्वहीन सामग्री थोपने की यह प्रवृत्ति निंदनीय है और इसे शुरुआत में ही रोका जाना चाहिए।” इसके साथ ही पीठ ने चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह के मामलों में जुर्माना लगाया जाएगा, और यदि कोई वकील ऐसा करता है, तो मामला बार काउंसिल को भी भेजा जा सकता है।

मामला क्या था?
यह विवाद मुंबई के ओशिवारा स्थित MHADA परिसर में एक फ्लैट के लीव एंड लाइसेंस समझौते से जुड़ा था। फ्लैट फिल्म निर्माता दीपक शिवकुमार बहरी का था, जबकि उसका उपयोग हार्ट एंड सोल एंटरटेनमेंट लिमिटेड कर रही थी, जिसका प्रतिनिधित्व मोहम्मद यासीन कर रहे थे। अदालत ने कंपनी द्वारा झूठी गवाही (परजरी) और अवमानना की कार्रवाई की मांग को भी खारिज कर दिया और निर्देश दिया कि 50,000 रुपये की राशि दो सप्ताह के भीतर हाई कोर्ट एम्प्लॉइज़ मेडिकल फंड में जमा कराई जाए।

लागत लगाने का कारण
ये याचिका दीपक शिवकुमार बहरी ने दाखिल की थी। जस्टिस साठये ने कहा कि बार-बार स्थगन मांगना और फर्जी कानूनी उद्धरणों पर भरोसा करना ऐसा आचरण है, जिसे हतोत्साहित करने के लिए प्रारंभिक स्तर पर ही सख़्त कार्रवाई ज़रूरी है। इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जनय जैन और ऋषभ जाधव (परिणाम लॉ एसोसिएट्स) ने पक्ष रखा, जबकि मोहम्मद यासीन खुद अदालत में उपस्थित हुए।