चैत्र पूर्णिमा 2026: जानिए व्रत, स्नान और दान की सही तारीख और मुहूर्त

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नई दिल्ली : चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को चैत्र पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन व्रत, स्नान और दान का विशेष महत्व होता है। लेकिन इस बार चैत्र पूर्णिमा तिथि 1 अप्रैल और 2 अप्रैल दोनों दिन आ रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि चैत्र पूर्णिमा का व्रत (Fast) कब रखा जाए, और स्नान और दान कब किया जाए। इसके लिए पंचांग की मदद लेना जरूरी है। पंचांग में जिस दिन सूर्योदय होगा, उस दिन स्नान और दान किया जाएगा। वहीं जिस दिन चंद्रोदय होगा, उस दिन व्रत रखा जाएगा।

सूर्योदय का समय और स्नान-दान

1 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा तिथि सूर्योदय 06:11 बजे से शुरू हो रही है, जबकि 2 अप्रैल को सूर्योदय 06:10 बजे होगा। उदय तिथि के आधार पर स्नान और दान 2 अप्रैल गुरुवार को करना उचित माना गया है। इसलिए इस वर्ष चैत्र पूर्णिमा का स्नान और दान 2 अप्रैल को किया जाएगा।

चैत्र पूर्णिमा तिथि में 1 अप्रैल को चंद्रोदय 06:11 बजे होगा, जबकि 2 अप्रैल को चंद्रोदय 07:07 बजे होगा। चंद्रोदय 1 अप्रैल को होने के आधार पर चैत्र पूर्णिमा का व्रत 1 अप्रैल को रखना उचित है। इस व्रत में पूर्णिमा तिथि के चंद्रमा की पूजा करके अर्घ्य दिया जाता है।

चैत्र पूर्णिमा 2 अप्रैल को ब्रह्म मुहूर्त 04:38 से 05:24 बजे तक है। यह समय स्नान के लिए उत्तम माना जाता है। यदि इस समय स्नान न कर पाएं तो सूर्योदय के बाद भी स्नान किया जा सकता है। चैत्र पूर्णिमा व्रत में 1 अप्रैल को सुबह सत्यनारायण भगवान की पूजा होती है। इस दिन पूजा का मुहूर्त सुबह 06:11 से 09:18 बजे तक रहेगा। प्रदोष काल में सूर्यास्त 06:39 बजे के बाद माता लक्ष्मी की पूजा की जाएगी। फिर रात के समय चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य किया जाएगा।

1 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा का व्रत चार शुभ योग में है। रवि योग सुबह 06:11 से 16:17 बजे तक रहेगा। इसके बाद सर्वार्थ सिद्धि योग शाम 16:17 से लेकर 2 अप्रैल सुबह 06:10 बजे तक रहेगा। वृद्धि योग प्रातःकाल से 14:51 बजे तक है, उसके बाद से ध्रुव योग रहेगा।

चैत्र पूर्णिमा के दिन व्रत और पूजा करने से परिवार में सुख और शांति आती है। माता लक्ष्मी की पूजा करने से दरिद्रता और धन-संकट दूर होता है और संपत्ति में बढ़ोत्तरी होती है। रात में चंद्रमा की पूजा और अर्घ्य देने से मनोबल मजबूत होता है और कुंडली के चंद्र दोष मिटते हैं। चैत्र पूर्णिमा को स्नान और दान करने से पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। स्नान के बाद पितरों के लिए तर्पण और दान करना चाहिए, जिससे पितरों का आशीर्वाद मिलता है।