चिनूक हेलिकॉप्टर का बड़ा कारनामा: पहली बार हवा से तैनात हुआ पोंटून असेल्ट ब्रिज, सेना की ताकत में जबरदस्त इजाफा

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भारतीय वायुसेना ने सैन्य क्षमता के क्षेत्र में एक अहम उपलब्धि हासिल की है। पश्चिमी सेक्टर में आयोजित संयुक्त सैन्य अभ्यास के दौरान भारी-भरकम चिनूक हेलिकॉप्टर की मदद से पहली बार पोंटून असेल्ट ब्रिज को हवाई मार्ग से सफलतापूर्वक तैनात किया गया। इस अभ्यास में भारतीय सेना की वेस्टर्न कमांड के साथ समन्वय स्थापित करते हुए सैन्य इंजीनियरों ने ब्रिज के हिस्सों को तेजी से पानी में जोड़कर तैयार किया।

संयुक्त अभ्यास में दिखी नई ताकत
अभ्यास के दौरान चिनूक हेलिकॉप्टर ने ब्रिज के विभिन्न सेगमेंट्स को उठाकर तय स्थान तक पहुंचाया, जहां इंजीनियरों ने उन्हें जोड़कर पुल का निर्माण किया। इस प्रक्रिया ने युद्ध जैसे हालात में त्वरित तैनाती की क्षमता को साबित किया।

पोंटून असेल्ट ब्रिज की रणनीतिक अहमियत
पोंटून असेल्ट ब्रिज सेना के लिए बेहद महत्वपूर्ण उपकरण है, जो नदियों, नहरों और अन्य जल अवरोधों को पार करने में मदद करता है। पश्चिमी कमांड के क्षेत्र में इस तरह की भौगोलिक चुनौतियां आम हैं। सामान्य परिस्थितियों में इस ब्रिज को भारी टाट्रा ट्रकों के जरिए तैनात किया जाता है और इसे जोड़कर करीब 300 मीटर लंबा पुल बनाया जा सकता है, जिस पर टी-90 भीष्म जैसे मुख्य युद्धक टैंक आसानी से गुजर सकते हैं।

चिनूक की ताकत: 11 टन तक उठाने की क्षमता
चिनूक हेलिकॉप्टर भारतीय वायुसेना का सबसे भारी ऑपरेशनल हेलिकॉप्टर है, जो करीब 11 टन तक वजन उठाने में सक्षम है। इसका टैंडम रोटर डिजाइन इसे पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में भी प्रभावी बनाता है। अरुणाचल प्रदेश से लेकर पूर्वी लद्दाख तक यह पहले ही अपनी उपयोगिता साबित कर चुका है।

पुरानी व्यवस्था से आगे बढ़ी तकनीक
इससे पहले इस तरह के भारी लिफ्ट ऑपरेशन के लिए रूसी मूल के हेलिकॉप्टरों का इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन चिनूक के शामिल होने के बाद सेना की क्षमता और लचीलापन दोनों बढ़े हैं।

जल अवरोध पार करने की क्षमता में बड़ा उछाल
नदियां, नहरें और खाइयां हमेशा से सैन्य अभियानों में बड़ी बाधा रही हैं। चिनूक के जरिए पोंटून ब्रिज की हवाई तैनाती से अब इन अवरोधों को तेजी से पार करना संभव हो गया है, जिससे ऑपरेशन की गति और प्रभावशीलता दोनों में बड़ा सुधार हुआ है।


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