चीन को झटका! बांग्लादेश ने बंदरगाह परियोजना के लिए डेनमार्क की कंपनी पर जताया भरोसा, भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम?
चीन की जगह डेनमार्क की कंपनी को मिली जिम्मेदारी
रिपोर्टों के अनुसार, बांग्लादेश में बंदरगाह विकास की योजनाओं में चीन की भूमिका को लेकर पहले अलग-अलग प्रस्तावों पर चर्चा हुई थी। मोंगला बंदरगाह की माल ढुलाई क्षमता बढ़ाने के लिए चीनी वित्तीय सहायता से दो आधुनिक कंटेनर जेटी बनाने की योजना थी। इसका उद्देश्य बंदरगाह पर माल की आवाजाही और संचालन क्षमता को बढ़ाना था।
हालांकि, अब बंदरगाह विकास में अन्य अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी भी बढ़ाई जा रही है। चटगांव बंदरगाह प्राधिकरण और डेनमार्क के मार्स्क समूह के बीच हुआ 30 साल का समझौता इसी दिशा में उठाया गया कदम माना जा रहा है।
चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश
बांग्लादेश की सरकारें पिछले कुछ वर्षों से समुद्री बंदरगाहों के विकास के लिए अलग-अलग देशों और अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ सहयोग करती रही हैं। इसका उद्देश्य बुनियादी ढांचे के विकास में किसी एक देश पर निर्भर रहने के बजाय कई साझेदारों की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
वर्ष 2025 में अंतरिम सरकार के कार्यकाल के दौरान जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जेआईसीए) के रियायती ऋण से मातारबाड़ी बंदरगाह के विकास और चटगांव में लाडिया कंटेनर टर्मिनल से जुड़ी परियोजनाओं के लिए समझौते किए गए थे। इन परियोजनाओं में डेनमार्क के मार्स्क समूह की भागीदारी भी शामिल थी।
इन योजनाओं से बांग्लादेश को बंदरगाहों की क्षमता बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय व्यापार को गति देने और समुद्री परिवहन से जुड़े बुनियादी ढांचे को आधुनिक बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
भारत के लिए क्यों अहम है बांग्लादेश का यह कदम?
बंगाल की खाड़ी और बांग्लादेश के समुद्री बंदरगाह भारत के व्यापारिक हितों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक स्थिति और समुद्री व्यापार मार्गों को देखते हुए बांग्लादेश के बंदरगाहों में किसी बाहरी शक्ति की बढ़ती रणनीतिक मौजूदगी पर नई दिल्ली की नजर रहती है।
यदि बांग्लादेश बंदरगाहों के विकास और संचालन में अलग-अलग देशों की कंपनियों को अवसर देता है, तो इससे किसी एक देश पर निर्भरता सीमित करने की संभावना बन सकती है। इसी कारण चीन के अलावा अन्य अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की बढ़ती भागीदारी को भारत के रणनीतिक हितों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
हालांकि, किसी विदेशी कंपनी को बंदरगाह के विकास या संचालन की जिम्मेदारी सौंपना अपने आप में सैन्य या रणनीतिक नियंत्रण हस्तांतरित करने के बराबर नहीं है। भारत को इससे कितना लाभ मिलेगा, यह समझौतों की शर्तों, बंदरगाहों के वास्तविक संचालन और क्षेत्रीय सहयोग की दिशा पर निर्भर करेगा।
सोनादिया बंदरगाह परियोजना पर भी रही थी नजर
बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में भी समुद्री क्षेत्र में चीन की बढ़ती व्यावसायिक मौजूदगी को लेकर भारत की चिंताओं की चर्चा हुई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, हसीना ने चीनी सहायता से सोनादिया में गहरे समुद्र का बंदरगाह बनाने की योजना को मंजूरी नहीं दी थी।
भारत की प्रमुख चिंताओं में उसके निकट महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में चीन की मौजूदगी बढ़ने की आशंका शामिल रही है। ऐसे में बांग्लादेश की बंदरगाह विकास नीति में विभिन्न देशों की भागीदारी को क्षेत्रीय संतुलन के नजरिये से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
कुल मिलाकर, बांग्लादेश के बंदरगाहों के आधुनिकीकरण में डेनमार्क और जापान जैसे देशों की भागीदारी से चीन के अलावा अन्य साझेदारों के लिए भी अवसर बढ़ रहे हैं। हालांकि, इसे चीन की सभी परियोजनाओं के रद्द होने या बांग्लादेश की नीति में पूरी तरह बदलाव के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।





