नए श्रम विवादों में नहीं चलेगी ‘उद्योग’ की पुरानी परिभाषा, सुप्रीम कोर्ट के फैसले से लाखों कर्मचारियों पर असर
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने ‘उद्योग’ शब्द की परिभाषा को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने 6:3 के बहुमत से स्पष्ट किया कि 1978 में दी गई ‘उद्योग’ की व्यापक और श्रमिक हितैषी परिभाषा को औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 की व्याख्या का आधार नहीं बनाया जाएगा। इस फैसले के बाद पुराने श्रम विवादों और 2020 की संहिता के तहत सामने आने वाले नए मामलों के लिए कानूनी स्थिति अलग हो गई है।
पुराने मामलों में लागू रहेगा 1978 का ट्रिपल टेस्ट
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुराने औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत पहले से चल रहे श्रम विवादों में 1978 में तय किया गया ‘ट्रिपल टेस्ट’ लागू रहेगा। वहीं, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत दर्ज होने वाले नए मामलों का फैसला उसी संहिता के प्रावधानों और संबंधित मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।
21 फरवरी 1978 को बेंगलुरु वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड मामले में सात जजों की संविधान पीठ ने ‘उद्योग’ की व्यापक परिभाषा तय की थी। इस फैसले ने उद्योग की श्रेणी का दायरा काफी बढ़ा दिया था और अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों, क्लबों तथा सरकारी कल्याण विभागों में काम करने वाले लाखों कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत कानूनी संरक्षण मिला था।
सीजेआई सूर्यकांत ने बहुमत का फैसला लिखा
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अपने साथ जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा, जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस विपुल एम पंचोली की ओर से बहुमत का फैसला लिखा। उन्होंने स्पष्ट किया कि 1978 के फैसले में निर्धारित ट्रिपल टेस्ट यह तय करने के लिए मान्य रहेगा कि किसी गतिविधि को ‘उद्योग’ माना जा सकता है या नहीं।
हालांकि, यह व्यवस्था केवल उन लंबित श्रम मामलों पर लागू होगी, जो अब रद्द हो चुके औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के तहत दर्ज किए गए थे। नए मामलों में 2020 की औद्योगिक संबंध संहिता के प्रावधानों के आधार पर स्थिति तय होगी।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अलग-अलग फैसले लिखकर मुख्य न्यायाधीश के बहुमत वाले फैसले से सहमति जताई। वहीं जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने अलग-अलग फैसलों में बहुमत के निर्णय से असहमति जताई।
क्या था 1978 का ट्रिपल टेस्ट
1978 में सात जजों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से फैसला सुनाया था। जस्टिस वीआर कृष्ण अय्यर की ओर से तैयार किए गए ट्रिपल टेस्ट के अनुसार, ऐसी व्यवस्थित गतिविधि जिसमें वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन या वितरण के लिए नियोक्ता और कर्मचारियों का सहयोग शामिल हो, उसे व्यापक तौर पर ‘उद्योग’ माना जा सकता है।
इस व्यापक व्याख्या के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत कानूनी सुरक्षा का दायरा मिला था।
लाखों कर्मचारियों पर पड़ सकता है असर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का प्रभाव सरकारी विभागों, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों समेत कई क्षेत्रों में काम करने वाले कर्मचारियों पर पड़ सकता है। पुराने मामलों में कर्मचारियों को 1978 के फैसले के तहत निर्धारित कानूनी सुरक्षा मिलती रहेगी, जबकि नए विवादों में औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के प्रावधान निर्णायक होंगे।
जानकारों के मुताबिक, यह फैसला आने वाले समय में श्रम कानूनों की व्याख्या और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।





