आजादी की पूर्व संध्या पर क्या कर रहा था भारत? 14 अगस्त 1947 की रात लिए गए थे नए राष्ट्र के बड़े फैसले

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नई दिल्ली। 14 अगस्त 1947 भारत के इतिहास का वह दिन था, जब देश ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता हासिल करने से कुछ ही घंटे दूर था। लेकिन यह दिन केवल 15 अगस्त का इंतजार करने तक सीमित नहीं था। इसी दौरान स्वतंत्र भारत की सरकार का ढांचा तैयार किया जा रहा था, मंत्रालयों की जिम्मेदारियां तय हो रही थीं और संविधान सभा उस ऐतिहासिक मध्यरात्रि सत्र की तैयारी में जुटी थी, जो देश के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ बनने वाला था। सत्ता हस्तांतरण के साथ भारत के सामने शासन व्यवस्था संभालने, आर्थिक मामलों को व्यवस्थित करने और रियासतों को नई राजनीतिक व्यवस्था में शामिल करने जैसी बड़ी चुनौतियां भी थीं।

स्वतंत्र भारत की पहली कैबिनेट में देश के प्रमुख नेताओं को अहम जिम्मेदारियां दी गई थीं। जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमंत्री के साथ विदेश मामलों, कॉमनवेल्थ संबंधों और वैज्ञानिक अनुसंधान की जिम्मेदारी मिली थी। सरदार वल्लभभाई पटेल को गृह, सूचना एवं प्रसारण और रियासतों से जुड़े विभाग सौंपे गए थे। रियासतों का एकीकरण उस समय बेहद महत्वपूर्ण चुनौती थी, क्योंकि देश में सैकड़ों रियासतें मौजूद थीं और उन्हें नई राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बनाना था। डॉ. राजेंद्र प्रसाद को खाद्य एवं कृषि और मौलाना अबुल कलाम आजाद को शिक्षा विभाग दिया गया था।

आजादी से पहले ही तैयार हो चुकी थी पहली कैबिनेट

डॉ. जॉन मथाई को रेलवे एवं परिवहन और सरदार बलदेव सिंह को रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी। जगजीवन राम श्रम मंत्रालय संभालने वाले थे। सीएच भाभा को वाणिज्य और रफी अहमद किदवई को संचार विभाग सौंपा गया था। राजकुमारी अमृत कौर को स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली थी, जबकि डॉ. बीआर आंबेडकर कानून विभाग संभालने वाले थे।

आरके षणमुखम चेट्टी को वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी। वहीं डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति तथा एनवी गाडगिल को कार्य, खान एवं बिजली विभाग सौंपा गया था।

यह कैबिनेट अचानक तैयार नहीं हुई थी। स्वतंत्र भारत की सरकार बनाने की प्रक्रिया पहले से चल रही थी। 4 अगस्त 1947 को जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन को नई कैबिनेट के सदस्यों के नाम भेजे थे। मंत्रालयों का अंतिम बंटवारा सरकार की शुरुआती बैठकों में किया जाना था। इसका मतलब साफ था कि 14 अगस्त तक भारत केवल स्वतंत्रता समारोह की तैयारी नहीं कर रहा था, बल्कि शासन की जिम्मेदारी संभालने की पूरी तैयारी भी कर चुका था।

मध्यरात्रि में गूंजा ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ का ऐतिहासिक भाषण

इसके बाद वह ऐतिहासिक क्षण आया, जिसका इंतजार पूरे देश को था। 14 अगस्त की मध्यरात्रि को संविधान सभा का विशेष सत्र आयोजित हुआ। इसी दौरान जवाहरलाल नेहरू ने अपना प्रसिद्ध ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ भाषण दिया। उन्होंने कहा कि जब दुनिया का बड़ा हिस्सा नींद में होगा, तब भारत जीवन और स्वतंत्रता के लिए जागेगा।

नेहरू के भाषण में स्वतंत्रता की खुशी के साथ नए भारत की जिम्मेदारियों का भी उल्लेख था। उनके लिए आजादी केवल सत्ता हासिल करने का अवसर नहीं थी। उन्होंने भारत की सेवा को करोड़ों देशवासियों की सेवा से जोड़ते हुए गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और असमानता से जूझ रहे लोगों के जीवन को बेहतर बनाने पर जोर दिया।

उनका संदेश था कि स्वतंत्रता के बाद असली काम शुरू होना था। देश को अपने सपनों को वास्तविकता में बदलने के लिए लगातार मेहनत करनी थी।

संविधान सभा ने लिया देश की सेवा का संकल्प

मध्यरात्रि के इसी ऐतिहासिक सत्र में भारत और उसके लोगों की सेवा करने का संकल्प लिया गया। इसमें देश को दुनिया में उसका उचित स्थान दिलाने के साथ विश्व शांति और मानव कल्याण में योगदान देने की प्रतिबद्धता भी शामिल थी।

आजादी की उस रात संविधान सभा में गीत गाने को लेकर भी चर्चा हुई थी। उस समय भारत का कोई आधिकारिक राष्ट्रगान नहीं था, इसलिए कार्यक्रम के दौरान गायन को लेकर विचार-विमर्श किया गया।

तिरंगा बन चुका था नए भारत की पहचान

स्वतंत्रता के साथ राष्ट्रीय ध्वज भी नए भारत की पहचान का प्रमुख प्रतीक बन चुका था। संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय किए थे। तिरंगे में मौजूद चक्र को भी विशेष प्रतीकात्मक महत्व दिया गया था।

राष्ट्रीय ध्वज भारत के अतीत की विरासत और भविष्य की आकांक्षाओं को जोड़ने वाले प्रतीक के रूप में सामने आया।

आर्थिक मोर्चे और रियासतों के एकीकरण की भी थी चुनौती

सत्ता हस्तांतरण के साथ आर्थिक मोर्चे पर भी तैयारियां चल रही थीं। भारत और ब्रिटेन के बीच वित्तीय मामलों को लेकर बातचीत हो रही थी और स्टर्लिंग बैलेंस से संबंधित समझौते किए जा रहे थे।

दूसरी ओर रियासतों का एकीकरण नए भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल था। यानी 14 अगस्त की रात देश एक तरफ स्वतंत्रता के उत्सव की तैयारी कर रहा था, तो दूसरी तरफ एक विशाल राष्ट्र को व्यवस्थित तरीके से चलाने की जिम्मेदारी भी सामने खड़ी थी।

इस लिहाज से 14 अगस्त 1947 की रात सिर्फ आजादी से पहले की आखिरी रात नहीं थी। यह उस भारत की नींव रखने वाली रात थी, जिसे अपनी सरकार खुद चलानी थी, अपनी समस्याओं का समाधान खुद तलाशना था और अपने भविष्य का निर्माण अपने फैसलों से करना था। आधी रात को देश ने स्वतंत्रता हासिल की, लेकिन उसी क्षण नए भारत के निर्माण की जिम्मेदारी भी उसके नेताओं और करोड़ों नागरिकों के कंधों पर आ गई।

 

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