इजरायल में गहराया संवैधानिक संकट! नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से किया इनकार, विपक्ष बोला- लोकतंत्र खतरे में
नई दिल्ली: इजरायल में प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव अब गंभीर संवैधानिक विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है। रविवार को इजरायली कैबिनेट ने सर्वसम्मति से सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानने से इनकार कर दिया, जिसमें कमर्शियल मीडिया रेगुलेटर सेकेंड अथॉरिटी फॉर टेलीविजन एंड रेडियो को अपना काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी। इस फैसले के बाद देश में न्यायपालिका और सरकार के अधिकारों को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे ‘जंगल राज की आहट’ करार दिया है।
पहली बार सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठुकराया
बताया जा रहा है कि इजरायल के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब किसी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को औपचारिक रूप से अस्वीकार किया है। विवाद की शुरुआत पिछले महीने हुई थी, जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा मीडिया रेगुलेटर की नई परिषद के गठन की प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि मौजूदा परिषद ही अपना काम जारी रखे, क्योंकि उसके कुछ सदस्यों के इस्तीफे के पीछे राजनीतिक दबाव होने की आशंका जताई गई थी।
सरकार बोली- अदालत कानून नहीं बदल सकती
प्रधानमंत्री नेतन्याहू सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि अदालत को कानून बदलने या रद्द करने का अधिकार नहीं है। संचार मंत्री श्लोमो कारही और न्याय मंत्री यारिव लेविन ने संयुक्त बयान में कहा कि सरकार ऐसे आदेशों को स्वीकार नहीं करेगी, जिन्हें वह कानून के विपरीत मानती है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे आदेशों के आधार पर लिए गए फैसलों को मान्यता नहीं दी जाएगी।
सरकार ने स्पष्ट किया कि मीडिया रेगुलेटर परिषद के भविष्य में लिए जाने वाले किसी भी निर्णय को वह स्वीकार नहीं करेगी, क्योंकि उसके अनुसार परिषद के पास आवश्यक कानूनी सदस्य संख्या मौजूद नहीं है।
विपक्ष और कानूनी विशेषज्ञों ने जताई चिंता
सरकार के इस फैसले की विपक्षी दलों और कानूनी विशेषज्ञों ने तीखी आलोचना की है। डिप्टी अटॉर्नी जनरल गिल लिमोन ने चेतावनी दी कि यदि सरकार अदालत के आदेशों का चयनात्मक तरीके से पालन करेगी तो इससे कानून के शासन को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने कहा कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी देश को अराजकता की ओर धकेल सकती है और इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी।
चुनाव से पहले न्यायपालिका को कमजोर करने का आरोप
डेमोक्रेट्स पार्टी के नेता यायर गोलान ने आरोप लगाया कि सरकार चुनाव से पहले न्यायपालिका की शक्तियों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है, ताकि भविष्य में राजनीतिक फैसलों को अपने पक्ष में प्रभावित किया जा सके।
मीडिया की स्वतंत्रता पर भी उठे सवाल
सरकार के फैसले के बाद पत्रकार संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों ने भी चिंता व्यक्त की है। उनका कहना है कि यह विवाद केवल एक मीडिया नियामक संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध प्रेस की स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और कानून के शासन से जुड़ा हुआ है।





